घाटशिला उपचुनाव की तैयारी तेज, चुनाव आयोग ने मतदाता सूची पुनरीक्षण का ऐलान किया। जानें सीट का राजनीतिक इतिहास और समीकरण।
रांची: घाटशिला उपचुनाव को लेकर झारखंड की राजनीति में एक बार फिर घाटशिला विधानसभा सीट एक बार फीर से चर्चा में है। पूर्व मंत्री रामदास सोरेन के निधन के बाद खाली हुई इस सीट पर उपचुनाव तय है। हालांकि तारीख का ऐलान अभी बाकी है, लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव के साथ ही घाटशिला उपचुनाव भी कराया जा सकता है।
चुनाव आयोग ने इस सीट पर तैयारी शुरू कर दी है। मतदाताओं के संक्षिप्त विशेष पुनरीक्षण का कार्यक्रम तय किया गया है। 1 जुलाई 2025 तक 18 वर्ष पूरे करने वाले लोग अपना नाम वोटर लिस्ट में दर्ज करा सकते हैं। 2 सितंबर 2025 को प्रारूप मतदाता सूची प्रकाशित होगी और 2 से 17 सितंबर तक नाम जुड़वाने, सुधार कराने या आपत्ति दर्ज करने का मौका मिलेगा। अंतिम मतदाता सूची 29 सितंबर 2025 को प्रकाशित की जाएगी।

रामदास सोरेन का निधन 15 अगस्त 2025 को हुआ था। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 151-ए के तहत इस सीट पर छह महीने के भीतर यानी 16 जनवरी 2026 से पहले मतदान कराना अनिवार्य है।
घाटशिला सीट का चुनावी इतिहास
2009: झामुमो के रामदास सोरेन ने कांग्रेस प्रत्याशी प्रदीप बालमूचू को हराया।
2014: भाजपा के लक्ष्मण टूडू ने जीत दर्ज की और झामुमो सीट हार गया।
2019: रामदास सोरेन ने फिर वापसी की और भाजपा प्रत्याशी लखन चंद्र माडी को हराया।
2024: लगातार चौथी बार उतरे रामदास सोरेन ने भाजपा प्रत्याशी बाबूलाल सोरेन को 22,446 वोटों के अंतर से मात दी।
Key Highlights
घाटशिला उपचुनाव की तैयारी में जुटा चुनाव आयोग
बिहार विधानसभा चुनाव के साथ हो सकता है उपचुनाव
मतदाता सूची का प्रकाशन 29 सितंबर 2025 को होगा
झामुमो ने 2009 से अब तक तीन बार जीती यह सीट
रामदास सोरेन के बेटे सोमेश सोरेन पर दांव लगा सकती है झामुमो
भाजपा के सामने उम्मीदवार चयन की चुनौती
झामुमो ने 2009 से 2024 के बीच तीन बार जीत दर्ज की और उनके वोट प्रतिशत में लगातार वृद्धि हुई।
सामाजिक समीकरण
यह सीट आदिवासी आरक्षित है। यहां 48.29% मतदाता एसटी वर्ग से हैं। एससी की हिस्सेदारी 5.32% है जबकि ओबीसी और सवर्ण मतदाता भी प्रभाव रखते हैं। ग्रामीण मतदाता 71.94% और शहरी मतदाता 28.07% हैं।
राजनीतिक समीकरण
रामदास सोरेन के निधन से झामुमो को सहानुभूति लहर का फायदा मिल सकता है। चर्चा है कि पार्टी उनके बेटे सोमेश सोरेन को प्रत्याशी बना सकती है और उन्हें मंत्री पद भी दिया जा सकता है। वहीं भाजपा के सामने चुनौती है कि बाबूलाल सोरेन को फिर से उतारा जाए या किसी नए चेहरे को मौका दिया जाए।
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