झारखंड में बालू संकट गहराया। 100 CFT बालू 6000 रुपए तक, टेंडर के बावजूद उठाव बंद, अवैध कारोबार बढ़ा, निर्माण कार्य प्रभावित।
Jharkhand Sand Crisis रांची: झारखंड में बालू की उपलब्धता और कीमत को लेकर गंभीर संकट सामने आया है। नदियों में बालू भरपूर होने के बावजूद लोगों को घर निर्माण के लिए महंगे दाम पर अवैध तरीके से बालू खरीदना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि 100 सीएफटी बालू की कीमत 6000 रुपए तक पहुंच गई है, जिससे आम लोगों की परेशानी बढ़ गई है।
Jharkhand Sand Crisis:टेंडर के बावजूद बालू उठाव शुरू नहीं
झरखंड हाईकोर्ट द्वारा 13 जनवरी को बालू घाटों के आवंटन पर लगी रोक हटाए जाने के बावजूद अब तक किसी भी जिले में बालू का उठाव शुरू नहीं हो सका है।
राज्य के आठ जिलों में कैटेगरी बी के घाटों का टेंडर और कॉन्ट्रैक्टर के साथ एग्रीमेंट हो चुका है, लेकिन कागजी प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण खनन शुरू नहीं हो पा रहा है।
पर्यावरण स्वीकृति, कंसेंट टू एस्टेब्लिश और कंसेंट टू ऑपरेट जैसी प्रक्रियाएं लंबित हैं, जिससे पूरा सिस्टम ठप पड़ा है।
Key Highlights
100 सीएफटी बालू की कीमत 6000 रुपए तक पहुंची
टेंडर के बावजूद बालू उठाव शुरू नहीं
पर्यावरण और कागजी प्रक्रिया में फंसा मामला
10 जून से खनन पर रोक, संकट और बढ़ने की आशंका
8 साल में तीन गुना तक बढ़ी बालू की कीमत
Jharkhand Sand Crisis:अलग-अलग जिलों में अलग कीमत, चाईबासा सबसे महंगा
राज्यभर में बालू की कीमत अलग-अलग जिलों में अलग है, लेकिन हर जगह कीमत सामान्य से कई गुना अधिक है।
रांची में 100 सीएफटी बालू 5000 रुपए तक बिक रहा है, जबकि चाईबासा में इसकी कीमत 6000 रुपए तक पहुंच गई है।
कोडरमा, जामताड़ा, लातेहार, रामगढ़, सिमडेगा और लोहरदगा में 2000 से 3500 रुपए तक बालू मिल रहा है, लेकिन मात्रा कम दी जा रही है, जिससे लोगों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
Jharkhand Sand Crisis:10 जून से खनन पर रोक, और बढ़ेगी परेशानी
राज्य में 10 जून से 15 अक्टूबर तक बालू खनन पर रोक लग जाएगी। यदि उससे पहले घाटों से उठाव शुरू नहीं हुआ, तो इस वर्ष भी बालू की भारी किल्लत बनी रहेगी।
इसका सीधा असर निजी मकान और अपार्टमेंट निर्माण पर पड़ेगा, जिससे निर्माण लागत और बढ़ेगी।
Jharkhand Sand Crisis:8 साल में तीन गुना बढ़ी कीमत
पिछले आठ वर्षों में बालू की कीमत तीन गुना तक बढ़ चुकी है। पहले 100 सीएफटी बालू 2000 से 2200 रुपए में मिल जाता था, जो अब 5500 से 6000 रुपए तक पहुंच गया है।
नीतिगत देरी, टेंडर प्रक्रिया में अड़चन और अवैध कारोबार के कारण यह स्थिति बनी है।
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