भगवान कृष्ण ने की थी गयाजी में इस शिवलिंग की स्थापना, मुगलों ने भी…

गयाजी: सावन का पवित्र महीना चल रहा है और भक्त भगवान शंकर को जलार्पण करने के लिए दूर दूर से मंदिरों में पहुंच रहे हैं। सावन के महीने में पूरे महीना भगवान शिव की पूजा अर्चना की जाती है और लोग कहते हैं कि इस सावन में भोले बाबा की पूजा अर्चना करने से सारी मनोकामनाएँ पूर्ण होती है। सावन के महीने में लोग विभिन्न क्षेत्रों में प्रसिद्ध शिव मंदिरों में जा कर पूजा अर्चना करते हैं। इन्हीं प्रसिद्ध मंदिरों में इसे एक है गयाजी स्थित एक शिवलिंग।

कहा जाता है कि मुगल आक्रमणकारियों ने इस शिवलिंग को तोड़ने की काफी कोशिश की थी लेकिन वे सफल नहीं हो सके थे। ऐसा माना जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना खुद भगवान कृष्ण ने की थी और इसका वर्णन वायु पुराण में भी है। यह शिवलिंग है गयाजी के अक्षयवट में। उज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर शिवलिंग की तरह बिहार के महाकालेश्वर शिवलिंग के रूप में यह स्थापित है। यहां शिवलिंग की बनावट में स्वयं महाकालेश्वर बने हुए हैं।

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कहा जाता है, कि ऐसा शिवलिंग देश में इक्के-दुक्के स्थान पर ही हो सकता है। गया जी के अक्षयवट में स्थित भगवान भोलेनाथ का यह अद्भुत शिवलिंग अत्यंत ही चमत्कारिक कहा जाता है। इस शिवलिंग को द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने पूजा करने के बाद खुद स्थापित किया था। यह इतना पौराणिक है, कि इसे वृद्ध परमपिता परमेश्वर के नाम से जाना जाता है। उज्जैन की तरह गयाजी में रहे महाकालेश्वर शिवलिंग के दर्शन पूजन के लिए बिहार से नहीं ही नहीं, बल्कि देश भर से लोग आते हैं। यहां आकर जिस कामना से पूजा की जाती है, उसकी प्राप्ति होती है।

महामृत्युंजय जाप, रुद्राभिषेक, कालसर्प दोष की शांति के लिए यहां सालों भर भक्तों का आना होता है। यहां पूजा से चमत्कारिक परिणाम सामने आते हैं। बिहार के गया जी में स्थापित वृद्ध परमपिता परमेश्वर जो कि बिहार के महाकालेश्वर शिवलिंग के रूप में जाने जाते हैं को लेकर कई ऐतिहासिक बातें हैं। कहा जाता है, कि यहां मुगल शासक आए थे। देश भर में मुगल शासक मंदिरों को क्षति पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे, तो उसी क्रम में इस भव्य मंदिर को भी क्षति पहुंचाने की कोशिश की गई। हालांकि, मुगल शासक इसमें पूरी तरह से नाकाम रहे।

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काफी कोशिश कर यहां से शिवलिंग को उखाड़ने का प्रयास किया, लेकिन महाकालेश्वर रूप का यह शिवलिंग मुगल शासको से नहीं उखड़ सका। थक कर मुगल शासक इसे छोड़कर चले गए। मुगल शासक यहां के चमत्कार देख इतने प्रभावित हुए कि मंदिर के भी किसी कोने में क्षति नहीं पहुंचाई। मुगल शासक भी इस चमत्कार को देखकर हैरान थे, क्योंकि शिवलिंग टस से मस नहीं हो रहा था और आखिरकार थक हारकर यहां से चले गए।

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गयाजी से आशीष कुमार की रिपोर्ट

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