मधुबनी: सुभद्रा देवी को पेपर मेशी कला के लिए मिलेगा पद्मश्री

मधुबनी : जिले के भिठ्ठी सलेमपुर गांव की निवासी सुभद्रा देवी को पेपर मेशी कला में उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्मश्री पुरस्कार मिलेगा. इसकी घोषणा भारत के 74वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर की गई. इस बार मधुबनी की सुभद्रा देवी सहित बिहार के 3 लोगों को पद्म श्री पुरस्कार से नवाजा जायेगा.

सुभद्रा देवी: 1991 में राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने राष्ट्रीय अवार्ड से किया था सम्मानित

87 वर्षीय सुभद्रा देवी का ससुराल मधुबनी जिला मुख्यालय के पास भिट्ठी सलेमपुर गांव में है. उनके भतीजा मुकेश कश्यप ने बताया कि सुभद्रा देवी को 3 बेटी और दो बेटे थे, जिनमें से बड़े बेटे का देहांत हो गया. सुभद्रा देवी को 1991 में राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा द्वारा राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित किया था. वर्तमान में सुभद्रा देवी अभी अपने छोटे बेटे आशीष के साथ दिल्ली में रहती हैं. सुभद्रा देवी का मायका दरभंगा जिले में मनिगाछी के निकट बलौर गांव में है.

बता दें कि पेपर मेशी कला में कागज को पानी में पहले फुलाया जाता है फिर उसे कूटकर विभिन्न आकार दिया जाता है. पेपर मेशी पर अब मधुबनी पेंटिंग कर उसे सजाया भी जाता है.

आनंद कुमार सहित इनको भी मिलेगा पद्म श्री

वहीं नालंदा निवासी कपिल देव प्रसाद को बावन बूटी बिनाई के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य हेतु पद्म श्री सम्मान दिया गया है. नालंदा के बसवन बिगहा गांव बावन बूटी का मुख्य निर्माण केंद्र रहा है. इसको लूम के तानों के सहारे तैयार किया जाता है. बावन बूटी से बने चादर, परदा आदि भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के समय में राष्ट्रपति भवन में लगवाए गए थे. जबकि आनंद कुमार को साहित्य और शिक्षा में योगदान के लिए पद्मश्री से पुरस्कृत किया गया है. आनंद कुमार सुपर 30 के नाम से बच्चों को पढ़ाने के बाद ज्यादा चर्चित हुए.

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आनंद कुमार को गण‍ित ने दिलाए सबसे ज्यादा मौके

01 जनवरी 1973 को आनंद कुमार का जन्म बिहार की राजधानी पटना में हुआ था. एक निम्न मध्यम वर्ग के परिवार से ताल्लुक रखने वाले आनंद के पिता डाक विभाग में क्लर्क थे. बचपन में आनंद का दूसरे बच्चों की तरह ही हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूल में एडमिशन करा दिया गया. आनंद ने शुरुआती श‍िक्षा पूरी करने के बाद पटना के बीएन कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली.

आनंद को सबसे ज्यादा पहचान उनके गण‍ित के प्रति विशेष लगाव ने दिलाई. वो बचपन से ही गणित में बहुत तेज थे. उनकी प्रतिभा के कारण उन्हें कैंब्रिज और शेफ़ील्ड विश्वविद्यालयों में पढ़ने के मौके थे. लेकिन, पिता की मृत्यु और आर्थिक तंगी ने उन्हें मजबूर कर दिया. वो आगे की पढ़ाई के लिए बाहर नहीं जा सके. अपने परिवार की दिक्कतों और संघर्ष करते हुए भी उन्होंने स्नातक में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया. स्नातक की पढ़ाई के दौरान आनंद कुमार ने अपनी नंबर थ्योरी पर जो पेपर जमा किए. वही पेपर बाद में मैथमेटिकल स्पेक्ट्रम और मैथमेटिकल गजट नाम के अखबार में भी प्रकाशित हुए.

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