आरक्षण कोटा पर सियासत तेज, जानिए मांझी के बयान पर किसने क्या कहा

पटना : झारखंड सरकार द्वारा आरक्षण कोटा बढ़ाए जाने के बाद बिहार में भी सियासत तेज हो गई है.

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने सरकार से आरक्षण कोटा बढ़ाने की मांग कर दी है.

इस मामले पर जदयू संसदीय बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि

यह केंद्र सरकार का मामला है. हमारी पार्टी केंद्र सरकार पर दबाव बनाने का काम करेगी.

आरक्षण कोटा बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार पर बनायेंगे दवाब- उपेंद्र कुशवाहा

उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि ओबीसी आरक्षण के समय भी केंद्र सरकार ने काफी कटौती की थी

और इसे महज 27 प्रतिशत रखा गया. लेकिन अब केंद्र सरकार द्वारा

इस बैरियर को तोड़ दिया गया है और अब 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था हो गई है.

आरक्षण कोटा बढ़ाने के लिए हमारी पार्टी केंद्र सरकार पर दवाब बनाएगी.

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जीवेश मिश्रा ने मांझी पर कसा तंज

वहीं मामले पर बीजेपी नेता जीवेश मिश्रा ने पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी पर

तंज कसते हुए कहा कि सरकार में हैं तो वह मांग क्यों कर रहे हैं.

सरकार तो कार्य करने के लिए होती है, मांग तो प्रतिपक्ष करता है. सरकार में है वह मांग ना करें बल का प्रयोग करें. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व तय करेगी आरक्षण कोटा बढ़ाना चाहिए या नहीं, इसके लिए हम अधिकृत नहीं हैं.

मांझी ने की आरक्षण कोटा बढ़ाने की मांग

झारखंड में आरक्षण कोटा बढ़ाए जाने के बाद अब बिहार में भी कोटा बढ़ाने की मांग उठने लगी. पूर्व मुख्यमंत्री और हम सुप्रीमो जीतन राम मांझी ने मांग की है कि जब आरक्षण का दायरा पड़ोसी राज्य में बढ़ गया है तो हम क्यों पीछे रहें. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को टैग करते हुए उन्होंने आग्रह किया है कि ‘‘जिसकी जितनी संख्या भारी मिले उसको उतनी हिस्सेदारी’’ के तर्ज पर सूबे में आबादी के हिसाब से आरक्षण लागू कर एक नजीर पेश करें. यही न्यायसंगत होगा.

झारखंड में 77 प्रतिशत आरक्षण पर विधानसभा की मुहर

बता दें कि झारखंड विधानसभा ने शुक्रवार को एक विशेष सत्र के दौरान राज्य में विभिन्न श्रेणियों के लिए आरक्षण को बढ़ाकर 77 प्रतिशत करने वाले विधेयक को अपनी मंजूरी दे दी. विधेयक में प्रस्ताव है कि राज्य संविधान की नौवीं अनुसूची में बदलाव के लिए केंद्र से आग्रह करेगा.

झारखंड में यह फ़ैसला तब लिया गया है जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने ईडब्ल्यूएस यानी आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए 10 फ़ीसदी आरक्षण पर मुहर लगाते हुए 50 फ़ीसदी आरक्षण सीमा पर अपना रुख बदलने का संकेत दिया है. इसके बाद से ही कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या अब आरक्षण के लिए वो पुरानी मांगें फिर से नहीं उठेंगी जिसके लिए कभी भारी हिंसा तक हो चुकी है? कई राज्यों में आरक्षण की ऐसी मांगें की जाती रही हैं, लेकिन 50 फ़ीसदी आरक्षण सीमा का हवाला देते हुए उनकी मांगों को ठुकरा दिया जाता रहा है.

रिपोर्ट: प्रणव राज

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