प्रेमभूषण महाराज बोले : भगवान किसी की सेवा और सत्कर्म का फल उधार नहीं रखते

लखनऊ : प्रेमभूषण महाराज बोले – भगवान किसी की सेवा और सत्कर्म का फल उधार नहीं रखते। लखनऊ के सुशांत गोल्फ सिटी (दयालबाग) में गत 10 अगस्त से प्रारंभ हुई नौ दिवसीय श्री राम कथा में प्रवचन करते हुए पूज्य प्रेमभूषण महाराज ने व्यासपीठ से कहा कि मनुष्य को परिणाम की चिंता नहीं करनी चाहिए उसे अपने कर्म को संभाल के रखने की आवश्यकता होती है।

फल तो अवश्य मिलेगा, भले उसके परिणाम को मिलने में थोड़ा समय लगे। वृक्ष लगाते ही फल नहीं देने लगता है , समय आने पर फल निकलते हैं। भगवान में श्रद्धा और विश्वास रखते हुए हमें निरंतर भजन पूजन में लगे रहना चाहिए।

हमारे सनातन सदग्रंथ बताते हैं कि फल की चिंता नहीं करते हुए जो निरंतर भजन पूजन और सत्कर्म में लगे रहते हैं, भगवान उन्हें उसका फल अवश्य प्रदान करते हैं।

प्रेमभूषण महाराज ने समझाया – ‘भगवान से सिर्फ यह मांगों कि चित्त उनमें लगा रहे’

सरस् श्रीराम कथा गायन के माध्यम से भारतीय और पूरी दुनिया के सनातन समाज में अलख जगाने  के लिए ख्यातिलब्ध कथावाचक प्रेमभूषण महाराज ने धनुष भंग और श्री सीताराम विवाह प्रसंगों का गायन करते हुए कहा कि मनुष्य को स्वयं तय करना होता है कि उसे क्या चाहिए और कितना चाहिए?

भगत की बहुत अधिक कामना नहीं होती है। भगवान से केवल एक ही कामना करनी चाहिए – हर परिस्थिति में हमारा चित्त आप में लगा रहे। एक और महत्वपूर्ण बात हमें याद रखनी चाहिए – माता सीता ने मां भगवती से अपने मन की कोई बात नहीं कही थी फिर भी उन्हें वह प्राप्त हो गया जो वह चाहती थीं।

हम भी भगवान से कुछ ना मांगने का स्वभाव बनाएं। भगवान से हमारी निकटता है तो वह हमारे मन को जान कर हमारे लिए जो उचित है वह स्वयं पूरा कर देंगे।

लखनऊ में प्रेमभूषण महाराज
लखनऊ में प्रेमभूषण महाराज

‘सत्कर्म करने वाले के लिए संसार की हर वस्तु सुलभ’ – बोले प्रेमभूषण जी महाराज

प्रेमभूषण जी महाराज ने आगे कहा कि मनुष्य का जीवन तप करने के लिए मिला है तप के माध्यम से ही हम अपने धरती पर आने के उद्देश्य को पूरा कर सकते हैं। गंगा जी को धरती पर लाने के लिए भगीरथ की चार पीढ़ियां ने तप किया था। जिस कुल में कोई भगत तपता है उसी कुल में नए भगत का आगमन भी होता है।

भगत की बुद्धि लेनदेन या बनिया की तरह नहीं होती है। क्या दिया तो क्या पाया यह भगत नहीं सोचता है। भगवान के चरणों में भगत की सहज ही गति होती है। यह पूरी सृष्टि भगवान के वश में है। मनुष्य के वश में कुछ भी नहीं है। जब भगवान से ही सब कुछ मिलना है तो भगवान में ही लगना चाहिए।

घर में हम अगर अर्चा विग्रह की सेवा करते हैं, जीव भाव से करते हैं तो विग्रह भी बोलने लगते हैं। अगर हम घर में छोटे बच्चों से बात ना करें तो वह भी नहीं बोल पाते हैं इसलिए घर में अगर लाल को रखा है तो उनसे जीव भाव रखते हुए उनसे बात करें, उनकी सेवा  करें।

सनातन धर्म, सत्य आचरण के समाज के निर्माण पर ही आधारित है। यह प्रमाणित सत्य है कि सतकर्म में रहने वाले व्यक्ति के लिए संसार की हर वस्तु सुलभ होती है ।

‘राजा धर्मशील हो तो प्रकृति भी देती है उसका पूरा-पूरा साथ’

इसी क्रम में प्रेमभूषण जी महाराज ने आगे कहा कि ठीक इसी प्रकार से अगर राजा धर्मशील हो तो प्रकृति भी उसके प्रजा पालन में उसका पूरा-पूरा साथ देती है। धरती एक मुट्ठी अन्न को सौगुना करके वापस करती है। मिथिलेश की वाटिका में भगवान राम के स्वागत में पूरी प्रकृति उमड़ पड़ी थी।

ठीक है इसी प्रकार से  त्रेता में जहाँ भी राजा धर्मशील होते थे,  समुद्र देव उनके स्वागत में अपने गर्भ से खजाने को लाकर तट पर बिखेर देते थे। पूज्य श्री ने कहा कि सनातन धर्म और संस्कृति में भगवान राम जी का चरित्र हमें बार-बार यह सिखाता है कि हमें जीवन में किस प्रकार रहना है।

जब हम राजा जनक जी की वाटिका के प्रसंग का दर्शन करते हैं जहां भगवान श्री राम और माता सीता जी  को एक दूसरे का पहली बार दर्शन हुआ था तो हमें यह पता चलता है कि शीलवान व्यक्ति कैसा होता है?

लखनऊ में प्रेमभूषण महाराज संग भगवत् पूजन करते यजमानगण।
लखनऊ में प्रेमभूषण महाराज संग भगवत् पूजन करते यजमानगण।

‘ऐसा व्यवहार न करें कि कोई परेशान हो जाए’

महाराज श्री ने कहा कि संसार में अच्छा बुरा दोनों ही उपस्थित है जो भगत लोग हैं उन्हें अच्छे को ग्रहण करते हुए अपने जीवन को धन्य बनाने की आवश्यकता होती है। अपनी दृष्टि पर संयम से यह संभव हो पाता है। जब हम अच्छा देखने का प्रयास करते हैं तो हमें सब कुछ अच्छा ही देखता है । क्योंकि हम जो देखते हैं वही सोचते हैं और धीरे-धीरे वैसा ही बन जाते हैं।

जीवन में हमें किसी के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए कि वो आपसे परेशान हो जाए। जितना हो सके जीवन को सरल और सहज बनाना चाहिए। सहजता ही ईश्वर की सर्वोपरि भक्ति है।

समाज में आम लोग श्रेष्ठ के ही आचरण का अनुकरण और अनुसरण करते हैं ऐसे में सभी श्रेष्ठ व्यक्तियों के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने आचार, व्यवहार, आहार में श्रेष्ठता का प्रदर्शन करें, जिनका अनुकरण किया जा सके।

‘धर्म पथ पर रहें तो घर से दुख भी बना लेता है दूरी, ऐश्वर्य होता है साथ’

प्रेमभूषण जी महाराज ने आगे कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति में यह बार-बार प्रमाणित हुआ है कि जो भी व्यक्ति धर्म  पथ पर चलते हुए संसार में विचरण करते हैं, उनके घर  से दुख भी दूरी बना कर रहता है और ऐश्वर्य स्वयं चलकर उनके घर पहुंचते हैं।

महाराज जी ने कहा कि मनुष्य को किसी के भी अपकर्मों की चर्चा करने से बचना चाहिए। जब हम किसी के किए गए गलत कार्यों की बार-बार चर्चा करते हैं तो उस तरह की स्थिति हमारे अपने जीवन में भी उपस्थित होने लगती है। महाराज श्री ने बताया आम जन जीवन में कहां उठना बैठना है, कहां नहीं जाना है, क्या खाना है? क्या नहीं खाना है । किससे कुछ लेना है और किससे कुछ नहीं लेना है आदि-आदि यही तो धर्म है।

जब कोई व्यक्ति धर्म को धारण कर धर्मशीलता के जीवन को जीने का प्रयास करता है तो भगवान भी उसकी मदद करते हैं। भगवान श्री राम की मिथिला यात्रा और धनुषभंग के  प्रसंगों का गायन करते हुए पूज्य महाराज जी ने कहा कि  हम जिस युग में जी रहे हैं उस काल में दान ही सर्वश्रेष्ठ धर्म कार्य है।

भगवान ने हमें कुछ देने के लिए ही दिया है । हम जो देते हैं , हमें वही वापस और ज्यादा मिलता है जैसे अगर हम धरती में एक मुट्ठी अन्न डालते हैं तो धरती माता हमें उसे 100 गुना करके देती हैं। इस कथा के प्रधान संकल्पी उत्तर प्रदेश के परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह की माता और दयाल ग्रुप के चेयरमैन राजेश सिंह दयाल ने सपरिवार व्यास पीठ पर उपस्थित भगवान का पूजन किया।

प्रदेश सरकार की कैबिनेट मंत्री देवी रानी मौर्य, मंत्री मयंकेश्वर शरण सिंह, मंत्री दिनेश प्रताप सिंह, डॉ. श्रद्धा राजपूत,भारत दीक्षित, कौशल जी, प्रशांत भाटिया सहित कई विधायक और कई विशिष्ट अतिथि कथा श्रवण के लिए पहुंचे थे। धनुष भंग प्रसंग का श्रवण करने के लिए बड़ी संख्या में उपस्थित श्रोतागण को महाराज जी के द्वारा गाए गए भजनों पर झूमते हुए देखा गया।

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