सिरमटोली रैंप विवाद: मंत्री चमरा लिंडा के आवास का आदिवासी संगठनों द्वारा घेराव तय, इलाके में सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम

रांची: राजधानी रांची के सिरमटोली फ्लाईओवर रैंप को लेकर उपजा विवाद अब एक गंभीर आंदोलन का रूप ले चुका है। सरना स्थल के समीप बन रहे इस रैंप के विरोध में कई आदिवासी संगठन एकजुट होकर आज मंत्री चमरा लिंडा के लोधबगांव स्थित आवास का घेराव करने जा रहे हैं। इसको लेकर क्षेत्र में भारी तनाव का माहौल है, और प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम कर दिए हैं। पुलिस बल की भारी तैनाती के साथ पूरे गांव को लगभग छावनी में तब्दील कर दिया गया है।

सिरमटोली फ्लाईओवर पर बन रहा एक रैंप आदिवासी समाज के लिए आस्था का प्रतीक माने जाने वाले सरना स्थल के ठीक सामने से गुजर रहा है। आदिवासी संगठनों का कहना है कि इससे उनके धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँच रही है और यह सांस्कृतिक विरासत पर सीधा हमला है। कई महीनों से वे इस मुद्दे को लेकर लगातार आंदोलनरत हैं।

इन आंदोलनों में शव यात्रा, मानव श्रृंखला, मशाल जुलूस, रांची बंद जैसे विभिन्न तरीकों से विरोध जताया गया है। बावजूद इसके, सरकार या स्थानीय प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस निर्णय या समाधान नहीं निकाला गया है।

पूर्व में मंत्री चमरा लिंडा और अन्य जनप्रतिनिधियों के साथ बैठकें हो चुकी हैं, जिनमें समाधान का आश्वासन दिया गया था। परंतु समय बीत जाने के बाद भी कोई निर्णय सामने नहीं आया, जिससे आदिवासी संगठनों में आक्रोश और निराशा व्याप्त है। सरहुल पर्व के अवसर पर भी काले पट्टे बांधकर इन संगठनों ने विरोध दर्ज कराया था।

आज आदिवासी संगठन बड़ी संख्या में मंत्री के गांव लोधबगांव में पहुंच रहे हैं। आंदोलन के स्वरूप को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने गांव की ओर जाने वाले रास्तों पर बैरिकेडिंग कर दी है और पुलिस बल को तैनात कर दिया गया है। केवल स्थानीय ग्रामीणों को ही अंदर जाने की अनुमति दी जा रही है, जबकि बाहरी आंदोलनकारियों को रोका जा रहा है।

इस आंदोलन की अगुवाई पूर्व शिक्षा मंत्री और वरिष्ठ आदिवासी नेत्री गीता उरांव कर रही हैं। वहीं, समाज के भीतर ही इस मसले पर दो राय है। एक ओर अजय तिर्की जैसे नेता रैंप को उचित बता रहे हैं, तो दूसरी ओर गीता उरांव और उनके समर्थक इसे धार्मिक स्थल के अपमान के रूप में देख रहे हैं।

राजेश कच्छप जैसे नेता यह कह चुके हैं कि रैंप हटवाने की कोशिश की जा रही है लेकिन इसके लिए वक्त लगेगा। उनका कहना है कि अचानक आंदोलन कर दबाव बनाना व्यावहारिक नहीं है क्योंकि ऐसे मामलों में प्रशासनिक प्रक्रिया और समय की जरूरत होती है।

भारतीय संविधान पार्टी ने भी इस आंदोलन को समर्थन देने की बात कही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष प्रेमशाही मुंडा और राष्ट्रीय सचिव प्रभाकर तिर्की ने स्पष्ट कहा है कि जब बात आदिवासी अस्मिता और धर्मस्थल की हो, तो उनकी पार्टी पीछे नहीं हटेगी। उनका यह भी कहना है कि सरकार को तत्काल इस पर ठोस निर्णय लेना चाहिए।

आंदोलनकारी संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि आज के घेराव के बावजूद भी उनकी मांगें नहीं मानी जाती हैं, तो वे भूख हड़ताल, अनिश्चितकालीन धरना और राज्यव्यापी आंदोलन की ओर कदम बढ़ाएंगे। उनका कहना है कि जब तक धार्मिक स्थल के समीप बना रैंप नहीं हटता, वे शांत नहीं बैठेंगे।

यह विवाद अब केवल रैंप या निर्माण का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता, आस्था और अधिकार की लड़ाई बन गया है। मंत्री के आवास का घेराव इस लड़ाई के एक नए चरण की शुरुआत मानी जा रही है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस मामले में जल्द समाधान निकालती है या यह आंदोलन और अधिक उग्र रूप लेता है।

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