शर्म की सड़क,शिलाडीह ग्रामीणों की गूंगी चीख,जब रास्ता ही नहीं तो विकास किस राह से आएगा:ग्रामीण

हजारीबाग: बरकट्ठा  प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत ग्राम शिलाडीह एक ऐसा गांव जिसे भगवान ने तो प्रकृति से नवाजा, लेकिन सरकार ने/सांसद ने/विधायक ने/जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों ने मूलभूत सुविधा से वंचित रखा।यहां की सबसे बड़ी विडंबना है कि एकमात्र मुख्य सड़क,जो गांव को जीटी रोड से जोड़ती है।यह सड़क अब सड़क नहीं,एक गड्ढों की श्रृंखला बन चुकी है।दो दशक पूर्व बनी यह कच्ची-पक्की सड़क अब धूल, कीचड़ और बदइंतज़ामी का प्रतीक बन चुकी है।बरसात के मौसम में यह सड़क जलमग्न दलदल बन जाती है और गर्मी में धूल के गुबार से सांस लेना दूभर हो जाता है।

शर्मिंदगी का रास्ता बनकर रह गया यह मार्ग

जब कोई अतिथि गांव आता है चाहे शादी हो,मैय्यत हो,यज्ञ हो गांव वालों को अपने गांव से नहीं, उस रास्ते से शर्म आती है।एक ओर जहां देश मेट्रो और एक्सप्रेसवे की बात कर रहा है, वहीं शिलाडीह गांव अब भी मूलभूत आवागमन जैसी सुविधा वंचित है।

आखिर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी क्यों?

शिलाडीह की इस दुर्दशा पर सबसे बड़ा सवाल है कहां हैं हमारे  सांसद,विधायक और प्रशासन?क्यों नहीं दिखता उन्हें यह टूटा हुआ रास्ता?यह कोई आज,कल या परसों की टूटी हुई सड़क नहीं है बल्कि दशकों से जर्जर है।ग्रामीणों ने सड़क की दुर्दशा पर कहा क्यों हर चुनाव में सिर्फ वादे बनते हैं और चुनाव के बाद यह सड़क फिर टूटे हुए सपनों की तरह छोड़ दी जाती है।क्या हम ग्रामीण इंसान नहीं हैं?क्या हम वोट देने के बाद अपने अधिकार खो देते हैं? या फिर माननीयों से डरे-सहमे रहते हैं जो खुलकर इस सड़क पर बहस नहीं कर सकते।क्या सरकार की “विकास यात्रा” सिर्फ पोस्टर तक ही सीमित है?सड़क के विकास के नाम से पोस्टर तो खूब छपती हैं, लेकिन शिलाडीह का नाम शायद उनके नक्शे में भी नहीं है।यह कोई मामूली मांग नहीं है —यह एक मूल अधिकार है।
सड़क नहीं,तो शिक्षा नहीं।
सड़क नहीं,तो स्वास्थ्य नहीं।
सड़क नहीं,तो रोज़गार नहीं।
सड़क नहीं,तो सम्मान नहीं।

ग्रामीणों ने अब ठान लिया है, अब मौन नहीं आंदोलन होगा ।हम हर कार्यालय के दरवाज़े खटखटाएंगे।शांतिपूर्ण जन आंदोलन,धरना से प्रेस तक हमारी बात पहुंचेगी।

पीयूष पाण्डेय की रिपोर्ट बरकट्ठा से

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