
झारखंड विधानसभा चुनाव: शिकारीपाड़ा सहित पांच सीटों पर झामुमो और भाजपा का अभेद्य दुर्ग
रांची: झारखंड की राजनीति में कुछ सीटें ऐसी हैं, जो गढ़ नहीं बल्कि अभेद्य किले बन चुकी हैं। यहां कोई बाहरी ताकत असर डालने की कोशिश तो करती है, लेकिन अंदर घुसना मानो नामुमकिन सा है। शिकारीपाड़ा, लिट्टीपाड़ा, और बरहेट जैसी सीटें झामुमो के लिए वही हैं, जैसे महाभारत में अर्जुन के पास गांडीव। दूसरी ओर, भाजपा ने रांची और कांके सीटों को 1990 से ऐसे थाम रखा है जैसे यह उनकी निजी जागीर हो।
शिकारीपाड़ा का इतिहास भी खासा दिलचस्प है। यहां 1979 के उपचुनाव में डेविड मुर्मू ने झामुमो के बैनर तले जो जीत दर्ज की, वह अब तक बरकरार है। नलिन सोरेन ने लगातार सात बार इस सीट पर झामुमो का झंडा लहराया और अब सांसद बनने के बाद भी झामुमो का साम्राज्य यहां कायम है। सवाल यह है कि आखिर विरोधी दल यहां भी चुनाव लड़ने की हिम्मत कहां से जुटाते हैं?
लिट्टीपाड़ा सीट पर भी 1980 से झामुमो का ऐसा कब्जा है कि बाकियों के लिए यह केवल दूर की कौड़ी है। साइमन मरांडी और उनका परिवार इस सीट पर दशकों से अपनी पकड़ बनाए हुए है। यहां बदलाव की उम्मीद करना ऐसे ही है, जैसे रेगिस्तान में पानी का कुआँ खोजना।
इसी तरह, भाजपा की रांची और कांके सीटें हैं, जो एक बार गुलशन लाल आजमानी और रामचंद्र बैठा के हाथों में क्या गईं, बस वहीं रह गईं। भाजपा के इन उम्मीदवारों का जो सिलसिला 1990 में शुरू हुआ, वह आज भी थमने का नाम नहीं ले रहा। लगता है, जैसे कांके और रांची भाजपा के लिए वही है जो किसी बाप-दादा की धरोहर हो।
अब सवाल उठता है कि इन सीटों का हाल बदलने वाला है या नहीं? क्या यहां नया इतिहास लिखा जाएगा या फिर पुराने रिकॉर्ड एक बार फिर कायम रहेंगे? विरोधी पार्टी चाहे जितनी भी कोशिश कर लें, लेकिन जनता की चुप्पी शायद इस चुनाव में भी अपने पुराने महारथियों को ही कंधों पर बिठाए रखने वाली है। तो देखना यह है कि झारखंड की राजनीति में बदलाव की बयार बहती है, या फिर अभेद्य किलों में एक बार फिर पुरानी सल्तनतें सजती हैं।




