“ताजपोशी, तक़दीर और टूटन: झारखंड की राजनीति में सियासी कटाक्ष”

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"ताजपोशी, तक़दीर और टूटन: झारखंड की राजनीति में सियासी कटाक्ष"
"ताजपोशी, तक़दीर और टूटन: झारखंड की राजनीति में सियासी कटाक्ष"
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रांची: झारखंड की राजनीति, जिसे कभी धरती से जुड़ी सादगी और आदिवासी अस्मिता का प्रतीक माना जाता था, आजकल दिल्ली की सियासी पराठे बेलने वाली बेलन के नीचे आ गई है। ताजपोशियों और तिकड़मों का ऐसा दौर शुरू हुआ है कि लगता है जैसे झारखंड भाजपा में हर नेता एक अदृश्य सिंहासन पर बैठने का सपना देख रहा हो।

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रघुवर दास की संभावित प्रदेश अध्यक्ष ताजपोशी पर चर्चा सुनकर ऐसा लग रहा है जैसे पार्टी ने गुटबाजी के मुद्दे को हल करने के लिए आग में घी डालने की विधि अपनाई है। रघुवर दास की छवि वैसे ही झारखंड में एक “वन-मैन आर्मी” की रही है, जहां “टीमवर्क” शब्द से उनका संबंध वैसा ही है जैसा “संवाद” का मूक फिल्मों से। ऐसे में उनकी वापसी से पार्टी का क्या भला होगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल भाजपा के भीतर कई चेहरे धुआं-धुआं दिख रहे हैं।

दूसरी ओर, बाबूलाल मरांडी को नेता प्रतिपक्ष बनाने की खबरें ऐसे फैल रही हैं जैसे बरसात में गांव की कच्ची सड़क पर चाय की चर्चा। उनकी सुदीर्घ पृष्ठभूमि और झारखंड की राजनीति में गहरी पकड़ को देखते हुए यह कदम स्वाभाविक है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि चंपई सोरेन जैसे नेताओं के लिए पार्टी ने किस तरह का “प्रोत्साहन पैकेज” तैयार किया है।

चंपई सोरेन की स्थिति इस समय “न घर के न घाट के” जैसी है। भाजपा में उनकी भूमिका उतनी ही अस्पष्ट है जितनी भारत की मानसून भविष्यवाणी। उन्हें भाजपा में लाने का वादा ऐसा था जैसे किसी को मृग मरीचिका दिखाना। झामुमो से आए सोरेन को अब यह सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि कहीं उनके साथ भाजपा में वही तो नहीं हो रहा जो बैलून के साथ होता है—उड़ने से पहले ही पिचक जाना।

अब झामुमो वाले भी पूरे “ओपन-डोर पॉलिसी” पर चल रहे हैं। उनका “दिल और दल दोनों के दरवाजे खुले हैं” बयान, राजनीति का वह पुराना जुमला है, जो अनसुलझे रिश्तों के लिए हमेशा तैयार रहता है। अगर चंपई वापस झामुमो में लौटते हैं, तो भाजपा के लिए यह वैसा ही होगा जैसे मैच में आखिरी गेंद पर छक्का खा जाना।

झारखंड भाजपा में यह उठापटक वैसी ही है जैसे किसी पुराने महल में नए राजा का स्वागत करना—जहां हर कोई सोच रहा है कि सिंहासन के नीचे से उनके हिस्से की ईंट खिसकाई न जा रही हो। सवाल यह है कि क्या रघुवर दास और बाबूलाल मरांडी की जोड़ी पार्टी को संगठित करेगी या फिर पार्टी के भीतर ही “आंतरिक विपक्ष” को जन्म देगी।

इस पूरे सियासी ड्रामे पर एक मशहूर कहावत याद आती है, “ऊंट के मुंह में ज़ीरा”। झारखंड भाजपा को आदिवासी समुदाय के समर्थन की दरकार है, लेकिन उनके पास चंपई सोरेन को लेकर कोई ठोस योजना नहीं है। अगर यही हाल रहा, तो भाजपा के नेता जल्द ही आपसी बहस के दौरान पूछेंगे, “मूंगफली में कितने दाने होते हैं?”

झारखंड की राजनीति में यह उथल-पुथल एक बात तो साफ कर देती है कि यहां हर नेता के पास दो चेहरे हैं—एक सार्वजनिक और एक निजी। बस, दोनों में फर्क इतना है कि जनता को दिखाया जाने वाला चेहरा अधिक मुस्कुराता है।

आखिरकार, झारखंड भाजपा के इस राजनीतिक नाटक में कौन जीतता है और कौन हारता है, यह तो समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि इस नाटक में जितने किरदार हैं, उतने ही संवाद हैं, और हर संवाद के पीछे एक तीखा सवाल—”अब आगे क्या?”

 

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