झारखंड में खतियान नीति जैसा पुराना मुद्दा इस बार के चुनाव रहा गुम, सबकी निगाहें संथाल पर

डिजीटल डेस्क : झारखंड में खतियान नीति जैसा पुराना मुद्दा इस बार के चुनाव रहा गुम, सबकी निगाहें संथाल पर। झारखंड में विधानसभा चुनाव 2024 का शोर सोमवार शाम को थम भले ही गया लेकिन यह कई नए संकेत और सवाल छोड़ गया है। दो चरणों में मतदान वाले इस बार का विधानसभा चुनाव पूरी तरह यूटर्न ले चुका है।

झारखंड में 24 साल बाद चुनाव का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है। अब से 24 साल पहले गठित झारखंड में न तो इस बार पारंपरिक और मुद्दे की गूंज रही और ना ही पुराने समीकरणों की। झारखंड गठन के बाद पहली बार इस बार के चुनाव में न तो खतियान नीति बड़ा मुद्दा बना और ना ही 60 वर्सेज 40 की लड़ाई उफान पर दिखी।

नेता चाहकर भी उन पुराने बड़े मुद्दों को लेकर जनता के बीच नहीं गए जिन मुद्दों के बूते 24 साल के झारखंड की सियासत हिलोरें लिया करती थी। इसके पीछे कई सियासी वजहें और मजबूरियां भी सामने आई हैं।

1932 का खतियान वाले मुद्दे पर राजनीतिक दलों की चुप्पी चौंका गई…

इस बदले समीकरण के लिए सियासी गलियारों में 5 मुख्य फैक्टर को जिम्मेदार माना जा रहा है. कहा जा रहा है कि इन्हीं 5 फैक्टर्स की वजह से झारखंड के चुनाव में मुद्दे से लेकर समीकरण तक बदल गए हैं। सबसे बड़ा मुद्दा परदे की ओट में चला गया। राज्य के हर चुनाव में 1932 का खतियान बड़ा मुद्दा रहता है।

वर्ष 2019 में हेमंत सोरेन की सत्ता वापसी ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई थी लेकिन इस बार इस नारे की चर्चा न के बराबर ही रही। दूसरी ओर, भाजपा भी 1932 के खतियान को मुद्दा नहीं बना पाई जबकि जेएमएम तो इसे लागू न कर पाने की वजह से बैकफुट पर ही रही।

इसी के साथ एक और जिस मुद्दे पर पूरे चुनाव प्रचार के दौरान झारखंड में सियासी दलों की चुप्पी देखी गई है, वह है – 60 बनाम 40 की चर्चा। झारखंड गठन के वक्त से ही 60 बनाम 40 का मुद्दा सबसे अहम रहा है। यहां की स्थानीय सियासी पार्टियों के मुताबिक राज्य की 60 प्रतिशत आबादी स्थानीय है, जबकि 40 प्रतिशत आबादी बाहरी।

मोटे तौर पर देखें तो झारखंड की 81 सीट में से करीब 55 सीटों का गणित स्थानीय लोग ही सेट करते हैं। इसी कारण ये मुद्दा यहां की सियासत में अहम रोल निभाता रहा है। इसी के साथ एक और बड़ा पारंपरिक मुद्दा झारखंड की सियासत को प्रभावित करता रहा है।

इस बार जातियों की गोलबंदी  रही गुम, महिला वोट बैंक के साथ आदिवासी अस्मिता की रही गूंज…

झारखंड के चुनाव में आमतौर पर आदिवासी, कुर्मी और यादव जातियों का दबदबा देखा जाता रहा है। साथ ही यहां राजनीतिक पार्टियां अलग-अलग हिस्सों में जातीय गोलबंदी करती रही हैं लेकिन इस बार यहां जाति की लड़ाई भी कुंद दिखी। पहली बार झारखंड की सियासत में इस बार घुसपैठी और आदिवासी अस्मिता ही बड़ा मुद्दा दिखे।

हालांकि, चुनाव से पहले कुर्मी समुदाय को जोड़ने के लिए क्षेत्रीय नेता जयराम महतो ने बिगुल जरूर फूंका था, लेकिन बाद में चुनावी मौसम में मामला ठंडे बस्ते में ही दिखा। आरजेडी झारखंड में भी यादवों की गोलबंदी जरूर करती रही है, लेकिन वह भी इस बार झारखंड में सत्तारूढ़ गठबंधन की अगुवाई कर रहे हेमंत सोरेन के भरोसे ही चुनावी मैदान में दौड़ लगाती दिखी।

धर्म, जाति और समुदाय के बीच बंटे झारखंड में इस बार महिलाओं का नया वोटबैंक बना। दोनों ही गठबंधन के केंद्र में इस बार महिलाएं रहीं। इंडिया गठबंधन मईयां (मैया) सम्मान योजना के सहारे महिलाओं को साधती रही तो एनडीए ने गोगो दीदी और एक रुपए में जमीन रजिस्ट्री का दांव खेला।

दोनों ही गठबंधन ने इस बार महिला उम्मीदवारों को भी जमकर मैदान में उतारा। चुनाव आयोग के मुताबिक झारखंड में इस बार 128 महिलाएं चुनावी मैदान में हैं जबकि 2019 में यह संख्या 127 और वर्ष 2014 में 111 था।

पहली बार झारखंड में नहीं दिखा तीसरे मोर्चे जोर और बिहार की सियासी पार्टियां भी रहीं हाशिए पर…

यही नहीं, एक और खास बात इस बार के चुनाव प्रचार के दौरान सामने आई है। वह यह कि इस बार के चुनाव में तीसरा मोर्चा सरीखा कोई बात कत्तई नहीं दिखी। बता दें कि झारखंड के चुनाव में शुरुआत से तीन मोर्चे का दबदबा दिखता रहा है। वर्ष 2005 के चुनाव में एक तरफ भाजपा-जेडीयू का गठबंधन था तो दूसरी तरफ कांग्रेस और झामुमो ने मोर्चा तैयार किया था।

आरजेडी, आजसू और माले जैसी पार्टियां भी अलग सेपूरे चुनाव को प्रभावित करने में कामयाब रही थीं। भाजपा गठबंधन को इस चुनाव में 27 प्रतिशत, कांग्रेस गठबंधन को 26 प्रतिशत और अन्य को 15 प्रतिशत वोट मिले थे। शेष वोट निर्दलीय को मिले थे।

फिर वर्ष 2009, 2014 और 2019 के चुनाव में बाबू लाल मरांडी की पार्टी झाविमो तीसरे मोर्चे की भूमिका निभाती रही, लेकिन अब वह भाजपा की कमान संभाले हुए हैं। यानी इस बार 2024 का चुनाव सीधे तौर पर एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच ही दिखा। इसी क्रम में झारखंड की सियासत में बिहार की पार्टियों का दबदबा कम होता हुआ दिखा।

वर्ष 2005 में जेडीयू 18 और आरजेडी 51 सीटों पर चुनाव लड़ी थी जबकि  माले ने भी 28 उम्मीदवार उतारे थे। वर्ष 2009 में भी आरजेडी ने 56 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे जबकि जेडीयू ने भी 14 उम्मीदवार उतारे थे। वर्ष 2014 और 2019 में भी बिहार की पार्टियों का दबदबा रहा और 2019 में एक सीट जीतने वाली आरजेडी को हेमंत ने कैबिनेट में जगह दी, लेकिन इस बार बिहार की पार्टियों का सियासी दबदबा घट गया।

इसे सीधे तौर पर इस तरह भी समझा जा सकता है कि इस बार आरजेडी ने 5 सीटों पर समझौते के तहत चुनाव लड़ा है जबकि जेडीयू को भी अपने गठबंधन में सिर्फ 2 सीटें ही मिली है तो माले भी गठबंधन की सियासी मजबूरी में 4 सीटों पर ही उम्मीदवार उतार पाई।

झारखंड के सियासी रण में इन चेहरों की प्रतिष्ठा है दांव पर।
झारखंड के सियासी रण में इन चेहरों की प्रतिष्ठा है दांव पर।

आखिरी चरण में संथाल परगना पर टिकी सबकी निगाहें, जनजाति वोटरों को लेकर मची रही जबरदस्त खींचतान…

झारखंड की राजनीति में हमेशा से अहम भूमिका निभाते रहने वाले संथाल परगना पर विधानसभा चुनाव 2024 को लेकर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। झारखंड की सत्ता निर्धारित करने में यह परगना अहम भूमिका निभाता है। इसलिए सभी दल का फोकस संथाल जीतने पर रहता है।

वर्तमान सरकार में भी मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और कई मंत्री संथाल परगना प्रमंडल से ही हैं। राज्य में विधानसभा के कुल 81 सीटों में से संथाल परगना में 18 विधानसभा सीटें हैं और इसी परगना से सीएम मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी हैं।  सीएम हेमंत सोरेन जिस बरहेट विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, वह भी संथाल परगना में ही है।

सत्ताधारी गठबंधन के लिए शिबू सोरेन का गृह क्षेत्र होने के कारण संथाल की सीटें नाक का सवाल बनी हैं तो भाजपा भी प्रतिद्वंद्वी को उसके घर और गढ़ में ही घेरने की रणनीति में पूरे प्राण-प्रण से जुटी रही।

वैसे भी इस राज्य की आबादी में सबसे बड़े वर्ग आदिवासी समाज की आबादी में भी सबसे अधिक भागीदारी संथाल जनजाति की है जिसका बड़ा हिस्सा संथाल परगना में निवास करता है। यहां के सियासी मिजाज का संदेश धनबाद-गिरिडीह के इलाके में रहने वाले संथाल मतदाताओं को भी प्रभावित करता है।

परगना में घुसपैठ, जल और जंगल हमेशा से भावनात्मक मुद्दा रहा है और इसीलिए भाजपा इस क्षेत्र में केंद्र सरकार की योजनाओं के साथ-साथ लैंड जिहाद, लव जिहाद और जॉब जिहाद की बातें उठाती रही।

इतना ही नहीं, भाजपा की रणनीति संथाल में आदिवासी अस्मिता के जेएमएम के दांव को शिबू सोरेन के परिवार की ही ,सीता सोरेन और सिद्धो-कान्हू के वंशज मंडल मुर्मू के जरिए काउंटर करने की रही। उसी क्रम में भाजपा ने चंपई को सीएम पद से हटाए जाने को भी आदिवासी अस्मिता से जोड़ जनता के बीच गई।

संथाल परगना में बदलती डेमोग्राफी और बांग्लादेश के नागरिकों के घुसपैठ को भी भाजपा मुखरता से उठाती रही और इसे अपने संकल्प पत्र में रखा। भाजपा संथाल परगना में भावनात्मक मुद्दों के सहारे चली।

सरना धर्म कोड की मांग जो लंबे समय से की जा रही है और इसको आदिवासियों की पहचान और संस्कृति को पहचानने और संरक्षित करने के लिए एक अहम कदम माना जा रहा है। सरना धर्म, भारतीय धर्म परंपरा का ही एक आदि धर्म है  जिसका पालन छोटानागपुर के पठारी इलाकों के कई आदिवासी करते हैं।

सरना कोड की मांग को लेकर, आदिवासी समूहों ने कई राज्यों में धरने भी किए हैं। अब हेमंत सोरेन खुल कर इसके समर्थन में हैं।

बता दें कि संथाल परगना में कुल 18 सीटें हैं जिनमें से 7 सीटें अनुसूचित जनजाति और एक सीट एससी के लिए आरक्षित है तो 10 सीटें सामान्य हैं। बरहेट, दुमका, शिकारीपाड़ा, महेशपुर, लिट्टीपाड़ा, बोरियो और जामा विधानसभा सीट एसटी के लिए आरक्षित हैं जबकि देवघर सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित है।

सामान्य सीटों में जामताड़ा, गोड्डा, मधुपुर, सारठ, जरमुंडी, पोड़ैयाहाट, महागामा, पाकुड़, राजमहल और नाला शामिल हैं।

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