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“काला हीरा” की लडाई: झारखंड की केंद्रीय बजट संघर्ष

रांची: झारखंड का “काला हीरा” (कोयला) सिर्फ खनिज नहीं, एक राजनीतिक हथियार बन गया है, जिसका इस्तेमाल कोई और के नहीं, सीधे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कर रहे हैं। आप समझिए, जब कोई शाही राजा अपनी सम्पत्ति का हक़ मांगता है, तो वह केवल सोने-चांदी की माँग नहीं करता, बल्कि अपने साम्राज्य की माटी का भी अधिकार छीनने की जिद करता है। झारखंड में “काला हीरा” का यही हाल है—विकास के लिए नहीं, बल्कि एक राज्य के ‘अधिकार’ के रूप में इसे चाँद सितारे की तरह चमकते हुए देखा जा रहा है।

“काला हीरा” की लडाई :

केंद्र सरकार ने झारखंड के 1.36 लाख करोड़ रुपए के बकाए को नकारा है। अगर यह सिर्फ राजस्व विवाद होता तो कोई बात नहीं, लेकिन यह मामला कुछ और ही है—यह झारखंड के अस्तित्व का सवाल बन गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का कहना है कि “यह हमारी राजनीतिक और आर्थिक ताकत का संघर्ष है,” और इसे उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने प्री-बजट बैठक में रखा। अब, यह एक सवाल बन गया है कि क्या राज्य सरकार को यह धन इसलिए मिलना चाहिए कि कोयला खनन सिर्फ झारखंड में हो रहा है, या फिर इसकी पूरी प्रक्रिया राज्य सरकार को ही देने का हक है?

“काला हीरा” की लडाई :

सुप्रीम कोर्ट ने भी झारखंड के पक्ष में आदेश जारी किया है, लेकिन केंद्र सरकार का कहना है कि “जो दे चुके हैं, वह काफी है”—क्या यह ‘बहुत देना’ और ‘काफी देना’ के बीच का फर्क नहीं है? झारखंड सरकार का कहना है कि बकाए की रकम ‘कोल वाश’ और भूमि अधिग्रहण जैसे मदों में अभी भी लंबित है। अब सवाल उठता है कि क्या कोल वाश करना भी उतना ही आवश्यक है जितना की गंदे बर्तनों को धोना? और क्या भूमि अधिग्रहण के लिए झारखंड का ‘काले हीरा’ भी एक प्रकार का प्राकृतिक हक नहीं?

“काला हीरा” की लडाई :

इस संघर्ष को अब राजनीति के सांचे में ढाल लिया गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भाजपा सांसदों से अपील की है कि वे इस संघर्ष में झारखंड की आवाज उठाएं। लेकिन भाजपा भी अपनी ओर से कम नहीं है—प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने तो आंकड़ों का पूरा ब्रेकअप तक मांग लिया है। अब भैया, इन आंकड़ों की सच्चाई भी वही जान सकता है जो खुद कोयला खनन में लगे रहे, बाकी सब तो अपना ‘काले हीरा’ छीनने में ही लगे हैं!

फिर आते हैं कांग्रेस और भाजपा के राजनैतिक ठहाके। कांग्रेस कहती है कि भाजपा का रुख चुनाव हारने के बाद “निर्लज्जता” की हद तक पहुंच चुका है, जबकि भाजपा कांग्रेस पर आरोप लगाती है कि वह हमेशा केंद्र के हाथों में खेलती रहती है। यह तो वही स्थिति है, जैसे एक टीचर अपने छात्रों को आपस में लड़वाए और खुद चुपके से शरबत पीता रहे।

“काला हीरा” की लडाई :

20 दिसंबर को फिर बैठक होगी, और सरकार की तरफ से उम्मीद की जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश और मुख्यमंत्री का पत्र केंद्रीय वित्त मंत्री तक पहुंच जाएगा। अब देखना होगा कि यह लड़ाई सिर्फ एक खनिज के लिए है या फिर किसी बड़े राजनैतिक शतरंज का हिस्सा है। कहीं न कहीं, झारखंड के “काले हीरा” की लड़ाई यह साबित करने की हो सकती है कि राज्य का ‘हक’ कभी छोटी बात नहीं होती—चाहे वह कोयला हो या राजनीति!

 

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