Gumla: झारखंड भले ही विकास के नए आयाम छू रहा हो, लेकिन आज भी कई ऐसे इलाके हैं जो विकास की पहुंच से कोसों दूर हैं। आजादी के 78 साल बीत जाने के बाद भी इन गांवों की तस्वीर नहीं बदली है। हम बात कर रहे हैं गुमला (Gumla) जिले के जारी प्रखंड के जरडा पंचायत के पहाड़ों की चोटी पर बसे गांव मंगरूतला की, जो आज भी विकास की बाट जोह रहा है और बुनियादी सुविधाओं से वंचित है।
Gumla: 25 से 30 परिवार निवास करते मंगरूतला में
मंगरूतला में 25 से 30 परिवार निवास करते हैं, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि सरकार द्वारा चलाई जा रही ‘अबुआ आवास‘ और ‘पीएम आवास’ जैसी योजनाओं का लाभ आज तक इस गांव के किसी भी परिवार को नहीं मिला है। ग्रामीण धनो खेरवाईन ने दुख जताते हुए बताया कि सड़क न होने के कारण उनके गांव में शादी के लिए रिश्ते तक नहीं आते। सरकारी प्रशासन की बात करें तो आज तक कोई भी सरकारी अधिकारी उनके गांव तक नहीं पहुंचा है। स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर मरीजों को खाट के सहारे 3 किलोमीटर दूर मुख्य मार्ग तक पैदल ले जाना पड़ता है। बरसात के दिनों में तो पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।
Gumla: चट्टानों से होकर गुजरना पड़ता है, सड़क का नामोनिशान नहीं
गांव तक पहुंचने के लिए कोई उचित सड़क नहीं है। पगडंडीनुमा रास्ते में बड़े-बड़े पत्थर और गहरी घाटियां हैं, जिससे हर रोज ग्रामीणों को सब्र का इम्तिहान देना पड़ता है। बड़ी मुश्किल से दोपहिया वाहन गांव तक पहुंच पाते हैं। सड़क न होने का दंश इस कदर है कि गंभीर स्वास्थ्य समस्या के वक्त मरीज को अस्पताल ले जाने के लिए खाट पर लाद कर 3 किलोमीटर दूर मुख्य सड़क तक ले जाना ही एकमात्र विकल्प बचता है।
Gumla: मटमैले कुएं के पानी से बुझ रही प्यास
सैकड़ों की आबादी पानी की हर जरूरत के लिए एकमात्र ‘कुएं’ पर निर्भर है। यह कुआं भी बढ़ती गर्मी के साथ सूखता जाता है, और बरसात के दिनों में पानी लाल व दूषित हो जाता है। एकमात्र कुएं से ग्रामीणों की पानी की हर जरूरत पूरी नहीं हो पाती। बड़ा सवाल यह है कि आजादी के अमृतकाल में भी मूलभूत समस्याओं के लिए तरस रहे यहां के ग्रामीणों को आखिर कब इन परेशानियों से निजात मिल पाएगी।
Gumla: आजादी के बाद से पानी और सड़क के लिए संघर्ष जारी
ग्रामीण धनो कोरवाइन, तेजू बड़ाइक और प्रसाद खेरवार का कहना है कि पानी के लिए कई बार आवेदन दिए गए हैं, लेकिन हर बार “हो जाएगा” कहकर टाल दिया जाता है। आज तक पानी नहीं आया है। आजादी के कई दशक बीतने और झारखंड निर्माण के 25 साल बाद भी मंगरूतला के ग्रामीण आज भी ढिबरी युग में जी रहे हैं। गांव में बिजली की पोल लगी है, लेकिन बिजली नहीं आई।
ग्रामीण मोबाइल और टॉर्च चार्ज करने के लिए दूसरे गांव जाते हैं या सोलर का सहारा लेते हैं। स्कूली बच्चे सोलर से बैटरी चार्ज करके या लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करते हैं। स्कूली बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिल पाती है। दिन के उजाले में तो पढ़ाई होती है, लेकिन रात के अंधेरे में पढ़ाई में दिक्कत होती है। ग्रामीणों के मुताबिक, जन समस्या शिविरों में भी शिकायतें की गईं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। ग्रामीण जहां भी जन समस्या शिविर लगते हैं, वहां आवेदन लेकर जाते हैं, और सारे अधिकारी समस्या के समाधान का आश्वासन देते हैं, लेकिन आज तक कोई समाधान नहीं हुआ है।
Gumla: छोटे बच्चों के लिए आंगनबाड़ी तक नहीं
नरुता कुमारी, दुर्गा खेरवार और तेतरू खेरवार ने बताया कि उनके गांव में 20 से 25 छोटे बच्चे-बच्चियां हैं, लेकिन आज तक यहां एक भी आंगनबाड़ी नहीं बनी है, जिससे उनके बच्चों के भविष्य पर गहरा असर पड़ रहा है। मंगरूतला गांव, जो डिजिटल युग में भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है, सरकार और प्रशासन से अपनी समस्याओं के त्वरित समाधान की उम्मीद लगाए बैठा है।
सुंदरम केशरी की रिपोर्ट
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