बच्चों को एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाने के मामले में झारखंड सरकार को हाईकोर्ट की फटकार, जानिए क्या कहा

रांची. रांची और चाईबासा में बच्चों को एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाए जाने के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने इस घटना को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि सरकार को इस पर तुरंत सख्त कदम उठाने होंगे। मुख्य न्यायाधीश तर्लोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, “झारखंड में बिना लाइसेंस के ब्लड बैंक क्यों चल रहे हैं? और अब तक इसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई?”

अदालत में मौजूद रहे शीर्ष अधिकारी

सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य सचिव अजय कुमार सिंह, झारखंड एड्स कंट्रोल सोसाइटी के प्रोजेक्ट डायरेक्टर और ड्रग कंट्रोलर झारखंड खुद कोर्ट में मौजूद थे। कोर्ट ने उनसे सवाल किया कि राज्य में ब्लड बैंक के लाइसेंस नवीनीकरण दो साल से लंबित क्यों हैं, और अब तक NAT मशीन (Nucleic Acid Test) क्यों नहीं लगाई गई, जबकि इसी मशीन से संक्रमित रक्त की पहचान की जा सकती है।

कोर्ट ने दिए कई अहम निर्देश

कोर्ट ने सरकार से कहा कि सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में हुए ब्लड डोनेशन कैंप का पूरा ब्यौरा कोर्ट में दिया जाए। साथ ही राज्य के अस्पतालों में रक्त की आवश्यकता, उपलब्धता और कमी की जानकारी भी चार हफ्ते के अंदर पेश करने का आदेश दिया गया।

अदालत ने यह भी कहा कि, “ब्लड डोनेशन में पारदर्शिता जरूरी है। पैसे लेकर ब्लड देने जैसी गलत प्रथाओं पर तुरंत रोक लगाई जाए।” कोर्ट ने निर्देश दिया कि ब्लड केवल अधिकृत ब्लड बैंकों के माध्यम से ही एकत्रित किया जाए, और NAT मशीन सभी जिलों में लगाई जाए, ताकि संक्रमित रक्त से किसी की जान को खतरा न हो।

सरकार का पक्ष

राज्य के महाधिवक्ता राजीव रंजन ने कोर्ट को बताया कि सरकार की ओर से अस्पतालों में नियमित रूप से ब्लड डोनेशन कैंप आयोजित किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में नेशनल ब्लड पॉलिसी को सही तरीके से लागू करने के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार किया जा रहा है।

कैसे सामने आया मामला

यह मामला तब सामने आया जब रांची सदर अस्पताल में थैलेसीमिया से पीड़ित एक बच्चे को ब्लड चढ़ाने के बाद एचआईवी संक्रमण पाया गया। बच्चे के पिता ने इस मामले को लेकर मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा, जिसे कोर्ट ने जनहित याचिका (PIL) में बदल दिया।

इसी तरह चाईबासा सदर अस्पताल में भी पांच बच्चे एचआईवी पॉजिटिव पाए गए, जिनमें से एक सात साल का थैलेसीमिया रोगी है। सुनवाई के दौरान लाइफ सेवर संस्था के अतुल गेरा और अधिवक्ता शुभम काटारुका ने भी पीड़ित पक्ष की ओर से तर्क रखे।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला मानव जीवन की सुरक्षा से जुड़ा है और सरकार को इस तरह की घटनाओं पर जीरो टॉलरेंस नीति अपनानी चाहिए। अदालत ने राज्य सरकार से पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है और अगली सुनवाई की तारीख तय की है।

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