जेएसएससी मामला : 10वीं और 12वीं परीक्षा राज्य के संस्थानों से ही पास करने की शर्त क्यों लगाई, हाईकोर्ट ने पूछा

जेएसएससी मामला : 10वीं और 12वीं परीक्षा राज्य के संस्थानों से ही पास करने की शर्त क्यों लगाई, हाईकोर्ट ने पूछा-

झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डॉ. रवि रजन और एसएन प्रसाद की अदालत में

जेएसएससी की संशोधित नियमावली मामले में सुनवाई हुई.

सुनवाई के दौरान अदालत ने इससे संबंधित पूरे रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद

राज्य सरकार से कई सवाल पूछे अदालत ने कहा कि किस आधार पर राज्य सरकार ने सामान्य वर्ग के लिए

10वीं और 12वीं की परीक्षा राज्य के संस्थानों से ही पास करने की शर्त लगाई है

और भाषा के पेपर से हिंदी और अंग्रेजी को बाहर कर दिया गया है.

इस मामले में राज्य सरकार की ओर से वरीय अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने पक्ष रखते हुए कहा कि

वह स्वयं इस मामले से संबंधित दस्तावेज को देखना चाहेंगे और अधिकारियों के साथ बैठक कर उचित सलाह देंगे.

उनकी ओर से इसके लिए समय की मांग की गई

जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया मामले में अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी.

किसी विज्ञापन को चुनौती नहीं दी गई

पिछली सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कहा गया कि उक्त याचिका सुनवाई योग्य नहीं है,

क्योंकि प्रार्थी की ओर से किसी विज्ञापन को चुनौती नहीं दी गई है. जिसमें वह आवेदन करने का इच्छुक है. सरकार की याचिका पर आपत्ति जताए जाने का जवाब देते हुए प्रार्थी की ओर से वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार, कुमार हर्ष और कुशल कुमार की ओर से बताया गया कि प्रार्थी मूलतः संबंधित नियमावली की शर्तों से प्रभावित है. बाद में दाखिल पूरक शपथ पत्र में जेएसएससी की ओर से जारी विज्ञापन के संबंध में जानकारी दी गई है.

बता दें कि प्रार्थी रमेश हांसदा और कुशल कुमार की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार की ओर से जेएसएससी नियुक्ति के लिए नई संशोधन नियमावली बनाई गई है. नियमावली के अनुसार नियुक्ति के लिए वैसे अभ्यर्थी पात्र है, जिन्होंने राज्य के संस्थान से दसवीं और 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की हो.

इसके अलावा जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं की सूची से हिंदी और अंग्रेजी को हटा दिया गया है. वहीं, अन्य उर्दू, ओड़िया और बांग्ला भाषा को शामिल किया गया है. राज्य के संस्थान से पास होने की अर्हता सिर्फ सामान्य वर्ग के लिए है, जबकि आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों को इससे छूट प्रदान की गई है.

याचिका में यह भी कहा गया है कि यह नियमावली संविधान की मूल भावना के विपरीत है और समानता के अधिकार का उल्लंघन है. वैसे अभ्यर्थी जो राज्य के निवासी होते हुए भी राज्य के बाहर से पढ़ें हो, उन्हें नियुक्ति परीक्षा से नहीं रोका जा सकता है, इसलिए नई नियमावली को निरस्त किया जाए.

रिपोर्ट: प्रोजेश दास

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