Tinsukia Adivasi Mahasabha:21वीं आदिवासी महासभा में Hemant Soren का संदेश, Assam के आदिवासियों के हर संघर्ष में झारखंड साथ

Tinsukia Adivasi Mahasabha: मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 21वीं आदिवासी महासभा में लोगों की समस्याएं सुनीं, असम के आदिवासियों को हर संघर्ष में साथ देने का भरोसा।


 Tinsukia Adivasi Mahasabha : असम के तिनसुकिया में रविवार को आयोजित 21वीं आदिवासी महासभा में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन शामिल हुए। कार्यक्रम का आयोजन ऑल आदिवासी स्टूडेंट एसोसिएशन ऑफ आसाम की ओर से किया गया था। इस दौरान मुख्यमंत्री ने असम में रह रहे आदिवासी समुदाय के लोगों से संवाद किया और उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना।

  1. तिनसुकिया में आयोजित 21वीं आदिवासी महासभा में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन शामिल

  2. असम में रह रहे आदिवासियों की समस्याएं सुनने पहुंचे मुख्यमंत्री

  3. आदिवासियों के हर संघर्ष में झारखंड के साथ खड़े रहने का भरोसा

  4. जल जंगल जमीन की रक्षा में आदिवासी समाज के ऐतिहासिक बलिदान का उल्लेख

  5. झारखंड के विकास मॉडल को अन्य राज्यों द्वारा अपनाए जाने का दावा


 Tinsukia Adivasi Mahasabha:आदिवासियों के हर संघर्ष में झारखंड साथ

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक कमजोरी का लाभ सामंती सोच वाले लोग लंबे समय से उठाते रहे हैं। आदिवासी समुदाय अपने हक, अधिकार और पहचान के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आवश्यकता पड़ने पर असम में रहने वाले आदिवासियों की मदद के लिए झारखंड का आदिवासी समाज हर स्तर पर आगे आएगा। आदिवासियों के सुख दुख और हर संघर्ष में झारखंड उनके साथ खड़ा रहेगा।

 Tinsukia Adivasi Mahasabha:असम में बसे आदिवासी समाज से सीधा संवाद

मुख्यमंत्री ने कहा कि असम में लगभग डेढ़ सौ वर्षों से रह रहे आदिवासी समुदाय से रूबरू होने का अवसर उन्हें मिला है। झारखंड मूल के वे आदिवासी और मूलवासी, जो असम में रहकर जीवन यापन कर रहे हैं, उनकी परेशानियों, अत्याचार और व्यथा को सुनने के लिए वे स्वयं यहां आए हैं। उन्होंने कहा कि झारखंड और असम के आदिवासियों का आपसी जुड़ाव ऐतिहासिक और भावनात्मक रूप से बेहद पुराना रहा है।

Tinsukia Adivasi Mahasabha: देश की अर्थव्यवस्था में आदिवासी समाज का योगदान

हेमंत सोरेन ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था में झारखंड का योगदान महत्वपूर्ण है और राज्य के विकास मॉडल को आज दूसरे राज्य भी अपना रहे हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज ने पीढ़ियों तक जल जंगल जमीन की रक्षा के लिए बलिदान दिया है। अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहले संघर्ष करने वालों में आदिवासी समाज अग्रणी रहा, इसके बावजूद यह समुदाय आज भी हाशिए पर है, जो चिंताजनक है।

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