Badkagaon Karma Puja: झारखंड के बड़कागांव प्रखंड में करमा पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों और लोक आस्थाओं के साथ मनाया जाता है। यहां करमा पूजा की शुरुआत एक खास रस्म ‘भूत भरनी’ के बाद होती है। इस परंपरा के कारण बड़कागांव का करमा उत्सव अन्य स्थानों से अलग पहचान रखता है। इस वर्ष 21 सितंबर को नहाय-खाय के साथ करमा पूजा की शुरुआत हो गई। 22 सितंबर को श्रद्धालु व्रत रखेंगे। रात आठ बजे से 10 बजे तक करम की डाल के नीचे पूजा-अर्चना होगी। इसके बाद रातभर झूमर गीत और नृत्य का आयोजन चलेगा। 23 सितंबर को करम की डाल को नदी या तालाब में विसर्जित किया जाएगा। विसर्जन के बाद भी दिनभर झूमर गीत और नृत्य का दौर जारी रहेगा।
तीज का डाला विसर्जन से पहले निभाई जाती है भूत भरनी
बड़कागांव में करमा पर्व की सबसे प्रमुख परंपराओं में भूत भरनी शामिल है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, तीज का डाला विसर्जित करने से पहले गवाट और भक्ताइन द्वारा यह रस्म निभाई जाती है। इसके बाद करम की डाल स्थापित की जाती है। करम की डाल को सात दिनों तक सुबह और शाम जगाने की परंपरा भी यहां प्रचलित है। इस दौरान पूजा-पाठ और लोक आस्थाओं से जुड़ी रस्में निभाई जाती हैं। करमा पूजा से एक दिन पहले संजोत के अवसर पर गांव के पाहन घनश्याम भुइयां रात करीब दो बजे देवी मंडप से भूत भरते हुए महोदी पहाड़ की गुफा तक जाते हैं। वहां से कदम के फूल लाकर देवी मंडप और गांव के अलग-अलग मंदिरों में चढ़ाए जाते हैं। इसके बाद इन फूलों को करमा के सभी अखाड़ों तक पहुंचाया जाता है। बड़कागांव के कई गांवों और मोहल्लों में देवास लगाने वाले भक्त भी भूत भरनी की रस्म निभाते हैं। इसके बाद करमा पूजा का विधिवत आरंभ होता है।
गांव में सुख-समृद्धि की है मान्यता
पाहन देवल भैया के अनुसार, भूत भरनी की परंपरा के पीछे यह विश्वास जुड़ा है कि इस रस्म के माध्यम से गांव के देवता ग्वांट और कुल देवता अखाड़े में आते हैं। इसके बाद वे लोगों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर वापस लौट जाते हैं। इसी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यता के आधार पर बड़कागांव में पीढ़ियों से भूत भरनी की परंपरा निभाई जा रही है। यह रस्म स्थानीय समुदाय की आस्था और सामूहिक विश्वास का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
‘आपन करम भैया के धरम’ से जुड़ी रस्म
करमा पूजा के दौरान कुंवारी और विवाहित महिलाएं, युवतियां तथा भाई भी अखाड़ों में करम की डाल के नीचे पूजा करते हैं। पूजा में खीरा और अंकुरित चना का विशेष महत्व होता है। इस दौरान भाई-बहन एक-दूसरे से पूछते हैं, ‘ककर करम?’ इसके जवाब में बहनें कहती हैं, ‘आपन करम, भैया के धरम।’ इसके बाद एक-दूसरे की पीठ पर खीरे से मारने की परंपरा निभाई जाती है। पूजा के बाद महिलाएं और युवतियां फलाहार करती हैं। अगले दिन सुबह करम की डाल को नदी या पोखर में विसर्जित किया जाता है। करमा पर्व की एक खास विशेषता यह भी है कि शादीशुदा महिलाएं पर्व मनाने के लिए मायके लौटती हैं। इससे गांव और मायके में उत्सव का माहौल बन जाता है।
करम-धरम की कथा से जुड़ा है पर्व
करमा पर्व को लेकर कई लोककथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, यह पर्व करम और धरम नामक दो भाइयों से जुड़ा है। दोनों भाई गरीब थे और उनकी बहन बचपन से ही भगवान से उनके सुख-समृद्धि की प्रार्थना करती थी। बहन की तपस्या और पूजा के कारण दोनों भाइयों के जीवन में खुशहाली आई। बाद में दोनों भाइयों ने अपनी बहन की रक्षा के लिए दुश्मनों से संघर्ष किया और अपनी जान गंवा दी। इसी कथा से करमा पर्व में भाई-बहन के प्रेम, त्याग और सुरक्षा की भावना जुड़ी मानी जाती है।
करम भगवान की पूजा से जुड़ी दूसरी लोककथा
करमा पर्व से जुड़ी एक अन्य लोककथा में करम और धरम नामक दो भाइयों का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, करम भगवान करमा की पूजा करता था। उसकी पत्नी ने गर्म दूध से करम के पौधे को स्नान करा दिया, जिससे उसका कर्म और भाग्य नष्ट हो गया और वह गरीबी में चला गया। वहीं, उसका भाई धरम विधि-विधान से पूजा करता रहा और समृद्ध हो गया। इसके बाद करम ने दोबारा करम की डाल की पूजा और सेवा शुरू की। मान्यता है कि इससे उसका भाग्य फिर जाग उठा। रास्ते में उसे सोना, चांदी और धन प्राप्त हुआ और वह दोबारा समृद्ध बन गया। करमा पर्व में प्रचलित ये लोककथाएं कर्म, आस्था, भाई-बहन के संबंध और सुख-समृद्धि की कामना का संदेश देती हैं। बड़कागांव में आज भी इन परंपराओं के साथ करमा पर्व सामूहिक उत्साह और सांस्कृतिक उल्लास से मनाया जाता है।
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