दुर्लभ चिकित्सीय स्थिति में सरोगेसी से मां बनने से नहीं रोक सकतेः सुप्रीम कोर्ट
रांची: सुप्रीम कोर्ट ने सरोगेसी (विनियमन) नियम 2022 के उस विवादित संशोधन पर फिलहाल रोक लगा दी है, जो किसी महिला को सरोगेसी से बच्चे को जन्म देने के लिए किसी डोनर के अंडे लेने से रोकता है।
ये भी पढ़ें-एयरटेल पेमेंट बैंक का कर्मी बन लोगों से ठगी, साईबर अपराधी सलाखों के पीछे
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की बेंच ने 7 दंपतियों की याचिका पर यह फैसला दिया। कोर्ट ने महिलाओं की मेडिकल रिपोर्ट देखी। इसमें इन्हें मेयर रोकिटान्स्की कस्टर हॉसर सिंड्रोम की दुर्लभ चिकित्सा स्थिति से पीड़ित बताया था। इसमें अंडाशय में भ्रूण को जन्म देने वाले अंडे नहीं बनते हैं।
इसी आधार पर महिलाओं ने सरोगेसी के लिए दिसंबर 2022 में कदम बढ़ाया, लेकिन 14 मार्च 2023 को एक सरकारी अधिसूचना के जरिए सरोगेसी नियम में संशोधन कर दिया गया। इसमें सरोगेसी के लिए किसी दूसरे जोड़े के स्पर्म व अंडों के उपयोग पर रोक लगा दी गई।
ये भी पढ़ें-रांची में कोर्ट फी स्टांप की कमी, अधिक कीमत पर मिल रहा
नए नियम में एक और पेंचः अधिकतम 50 साल की उम्र तक ही सरोगेसी
• याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि नए नयिमों क तहत सरोगेसी का लाभ उठाने के लिए महिलाओं की अधिकतम उम्र 50 वर्ष की गई है। उम्र को देखते हुए इन महिलाओं को तुरंत राहत देना जरूरी है।
• इस पर कोर्ट ने इन्हें राहत देने के लिए सरोगेसी नियम 14 का सहारा लिया। ये नियम उन स्थितियों को रेखांकित करता है, जिनमें एक जोड़ा सरोगेसी का विकल्प चुन सकता है। गंभीर चिकित्सीय स्थितियां भी उनमें से एक हैं। कोर्ट ने कहा कि नियमों में विशेष परिस्थितियों की अनदेखी करना सही नहीं है।




