डिजीटल डेस्क : Supreme Decision से पूर्व सांसद रमा देवी को मिला न्याय, दिवंगत बृजबिहारी प्रसाद की बिहार में बोलती थी तूती। बिहार की सियासत के लिहाज से Supreme कोर्ट ने गुरुवार को अहम हत्याकांड का फैसला सुना दिया।
बिहार के पूर्व मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की वर्ष 1998 में हुई हत्या के मामले में पूर्व विधायक मुन्ना शुक्ला समेत दो लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, संजय कुमार और आर महादेवन की पीठ ने सभी आरोपियों को बरी करने के पटना हाईकोर्ट के फैसले को आंशिक रूप से खारिज कर दिया।
इसी के साथ बिहार से शिवहर से भाजपा की पूर्व सांसद रहीं रमा देवी को अपने पति की हुई हत्या के मामले में न्याय मिल गया। पूर्व भाजपा सांसद के करीबियों ने कहा कि उन्होंने Supreme कोर्ट के फैसले पर संतोष जाहिर किया है।
बिहार के सियासत में बोलती थी बृजबिहारी की तूती
Supreme कोर्ट के इस फैसले के गुरूवार को सामने आते ही पूर्व भाजपा सांसद रमा देवी और उनके पति स्व. बृजबिहारी प्रसाद की रसूख वाली सियासत फिर से सुर्खियों में है।
अपने समय में बिहार के चर्चित मंत्री रहे बृजबिहारी प्रसाद को उस समय लालू यादव का आंख-कान माना जाता था। सरकार में बृजबिहारी काफी पावरफुल माने जाते थे।
वर्ष 1998 के जून महीने में पटना के आईजीआईएमएस हॉस्पिटल में बृजबिहारी प्रसाद की हत्या कर दी गई थी। हत्या का आरोप दिवंगत बाहुबली छोटन शुक्ला के भाई मुन्ना शुक्ला और उस वक्त के दबंग नेता सूरजभान और माफिया राजन तिवारी पर लगा। आरोप लगा कि तीनों की तिकड़ी ने यूपी के मोस्ट वाटेंड अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ला के जरिए बृजबिहारी की हत्या करवाई।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्व सांसद और बृज बिहार प्रसाद की पत्नी रमा देवी, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने साक्ष्य के अभाव में आरोपियों को बरी करने के फैसले को चुनौती दी थी। उन्होंने कोर्ट के 2014 के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
उससे पहले 24 जुलाई 2014 को हाईकोर्ट ने कहा था कि अभियोजन पक्ष के सबूतों और गवाहों को मद्देनजर रखते हुए सूरजभान सिंह उर्फ सूरज सिंह, मुकेश सिंह, लल्लन सिंह, मंटू तिवारी, कैप्टन सुनील सिंह, राम निरंजन चौधरी, शशि कुमार राय, मुन्ना शुक्ला और राजन तिवारी संदेह का लाभ पाने के हकदार हैं।
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 12 अगस्त 2009 के उस आदेश को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्हें दोषी ठहराया गया था और सभी आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।
Supreme कोर्ट 15 दिनों में दोनों दोषियों को सरेंडर करने को कहा
Supreme कोर्ट ने मंत्री बृजबिहारी की हत्या के दोषियों मंटू तिवारी और पूर्व विधायक शुक्ला को 15 दिनों के भीतर आत्मसमर्पण करने को कहा। हालांकि, शीर्ष कोर्ट ने पूर्व सांसद सूरजभान सिंह समेत 6 अन्य आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार उन्हें बरी करने के फैसले को बरकरार रखा।
पीठ ने कहा कि मंटू और विजय कुमार शुक्ला उर्फ मुन्ना शुक्ला के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और 307 (हत्या का प्रयास) के तहत आरोप साबित होते। उन्हें 15 दिनों के अंदर आत्मसमर्पण करना होगा।
बता दें कि बिहार के पूर्व मंत्री बृजबिहारी की हत्या के बाद उनके भाई श्याम बिहारी प्रसाद और पत्नी रमा देवी उनकी विरासत को संभालने सियासी मैदान में उतरे। उनकी पत्नी रमा देवी 2019 में शिवहर से लोकसभा की सांसद चुनी गई थीं लेकिन वर्ष 2024 के चुनाव में सियासी समीकरण की वजह से उनका टिकट कट गया था।

फिल्मी पटकथा से कम नहीं है मंत्री रहे बृजबिहारी प्रसाद के सियासी सफर का किस्सा…
बिहारी के मोतिहारी के आदापुर में एक गांव है- भेड़ियाही। यहीं पर 20 जुलाई 1949 को बृजबिहारी प्रसाद का जन्म हुआ था। गांव में शुरुआती पढ़ाई लिखाई करने के बाद बृजबिहारी आगे पढ़ने के लिए मुजफ्फरपुर के एमआईटी आ गए।
यहीं पर उसे छात्र राजनीति की तलब लगी। बताया जाता है कि बृजबिहारी प्रसाद राजनीति में आने से पहले ठेका पट्टा का काम करते थे। वर्ष 1990 में लालू यादव की पहल पर उन्हें पूर्वी चंपारण की आदापुर सीट से जनता दल ने टिकट दिया तो बृजबिहारी ने इस चुनाव में माले के मुक्ति नारायण राय को करीब 25 हजार वोटों से हराया।
चुनाव बाद जनता दल की सियासी तिकड़म की वजह से लालू यादव मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे। तब बृजबिहारी प्रसाद को भी लालू ने अपने कैबिनेट में शामिल कराया। बृजबिहारी ग्रामीण विकास विभाग में उपमंत्री बनाए गए।

लालू यादव के लिए वर्ष 1993 में बृजबिहारी प्रसाद और आनंद मोहन में शुरू हुई थी अदावत…
फिर वर्ष 1993 में जनता दल में पहली बड़ी बगावत हुई और बगावत का बिगूल फूंका राजपूत नेता आनंद मोहन ने। उसी वर्ष 1993 के वैशाली चुनाव में आनंद मोहन ने लालू के उम्मीदवार के सामने अपनी पत्नी को उतार दिया।
आनंद मोहन उस वक्त सवर्ण रक्षा का झंडा लिए मैदान में उतरे थे जबकि लालू पिछड़ी जाति की राजनीति पर फोकस जमाए हुए थे। भूमिहार बाहुल्य वैशाली में लालू के साथ खेल हो गया और आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद चुनाव जीत गईं।
उस चुनाव के बाद मुजफ्फरपुर के मतगणना केंद्र से आनंद मोहन ने ऐलान कर दिया कि 1995 में लालू को सत्ता से बेदखल कर देंगे।
तत्कालीन सियासी हलचल के पन्ने पलटने पर सामने आता है कि तब लालू यादव ने पिछड़ों की गोलबंदी शुरू की एवं तिरहुत और मिथिलांचल में आनंद मोहन को घेरने के लिए बृजबिहारी को आगे किया गया। उसके बाद बृजबिहारी प्रसाद और आनंद मोहन के बीच शुरू हुई सियासी अदावत।
वर्ष 1995 के चुनाव में प्रचार के दौरान केसरिया से आनंद मोहन के उम्मीदवार छोटन शुक्ला की हत्या हो गई। छोटन शुक्ला उस वक्त आनंद मोहन के दाहिने हाथ माने जाते थे। बृजबिहारी प्रसाद हत्या के आरोपी बनाए गए और वही आरोप उस वक्त बृजबिहारी के सियासी प्रमोशन का कारण भी बना।
वर्ष 1995 में लालू जब दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो अपनी सरकार में बृजबिहारी का कद बढ़ा दिया और उपमंत्री से सीधे कैबिनेट मंत्री बना दिया। बृज बिहारी को विभाग मिला विज्ञान और प्रद्यौगिकी का।
बिहारी सियासत में बाहुबलियों की दबंगई के बीच लालू के भरोसेमंद के रूप में अलग परचम फहरा रहे बृजबिहारी प्रसाद की वर्ष 1998 के जून महीने में पटना के आईजीआईएमएस हॉस्पिटल में हत्या कर दी गई।
Highlights







