बाल मजदूरी केस में HC का बड़ा फैसला: सुनील तिवारी की Interim Relief रद्द, बढ़ी कानूनी मुश्किलें

बाल मजदूरी मामले में हाई कोर्ट ने सुनील तिवारी को मिली अंतरिम राहत रद्द की। अरगोड़ा थाना केस में गैर जमानती धाराएं भी जुड़ सकती हैं।


Interim Relief रांची: रांची में बाल मजदूरी कराने के आरोपों में घिरे बाबूलाल मरांडी के पूर्व सलाहकार सुनील कुमार तिवारी की कानूनी चुनौतियां बढ़ गई हैं। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने उन्हें पूर्व में दी गई अंतरिम राहत को समाप्त कर दिया है।

यह राहत 18 अप्रैल 2022 के आदेश से मिली थी, जिसे अब अदालत ने निरस्त कर दिया है। कोर्ट के आदेश के बाद संबंधित निचली अदालत को भी तत्काल सूचना देने का निर्देश रजिस्ट्री को दिया गया है।


Key Highlights

  1. हाई कोर्ट ने सुनील कुमार तिवारी को मिली अंतरिम राहत रद्द की।

  2. 18 अप्रैल 2022 के आदेश से मिली राहत अब समाप्त।

  3. याचिका सही प्रारूप में दाखिल नहीं करने पर कोर्ट की टिप्पणी।

  4. एक सप्ताह में नई याचिका दाखिल करने का निर्देश।

  5. बाल श्रम अधिनियम और एससी एसटी एक्ट की गैर जमानती धारा जुड़ने का प्रस्ताव।


Interim Relief: सुनवाई के दौरान कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता फिलहाल मामले की सुनवाई के लिए तैयार नहीं है। रिकॉर्ड के अवलोकन के बाद कोर्ट ने पाया कि याचिका सही प्रारूप में दाखिल नहीं की गई थी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि एक सप्ताह के भीतर विधिसम्मत नई याचिका दाखिल नहीं की गई, तो मामला स्वतः खारिज मान लिया जाएगा और इसे बेंच के समक्ष सूचीबद्ध नहीं किया जाएगा।

सरकार की ओर से अधिवक्ता दीपांकर ने पक्ष रखा।

Interim Relief: क्या है पूरा मामला

सुनील कुमार तिवारी के खिलाफ अरगोड़ा थाना कांड संख्या 255 2021 दर्ज किया गया है। प्राथमिकी में बाल एवं किशोर श्रम प्रतिषेध एवं विनियमन अधिनियम 1986 की धारा 14 1 के तहत आरोप लगाए गए हैं।

जांच के दौरान अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 की धारा 3 1 h जोड़ने का प्रस्ताव भी रखा गया है। यह धारा गैर जमानती श्रेणी में आती है, जिससे मामले की गंभीरता और बढ़ सकती है।

Interim Relief:अंतरिम राहत खत्म होने का क्या असर

अंतरिम राहत समाप्त होने के बाद अब निचली अदालत में कार्रवाई की प्रक्रिया तेज हो सकती है। यदि नई याचिका समय पर और विधिसम्मत तरीके से दाखिल नहीं की गई, तो याचिकाकर्ता को सीधे नियमित कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।

इस घटनाक्रम से स्पष्ट है कि अदालत मामले को गंभीरता से देख रही है और तकनीकी त्रुटियों को लेकर भी सख्त रुख अपना रही है।

 

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