कैंसर की 600 रुपये की दवा 12 हजार MRP में बिकने की शिकायत पर सीएम ने जांच का आदेश दिया। दवाओं के भारी दाम और 1900% मार्जिन पर सवाल तेज।
Cancer Drug Price Hike Row – कैंसर मरीजों पर बढ़ते इलाज खर्च को लेकर एक बड़ी शिकायत सामने आने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने तत्काल जांच का आदेश दिया है। मामला पैक्लीटैक्सेल नाम की कीमोथेरेपी दवा का है, जिसकी खरीद कीमत सिर्फ 600 रुपये बताई जाती है लेकिन बाजार में इसकी MRP 12,000 रुपये तक रखी जाती है। शिकायत के अनुसार, एक मरीज को इलाज के दौरान 20 से 30 वायल की जरूरत पड़ जाती है, जिससे कुल खर्च कई गुना बढ़ जाता है।
Cancer Drug Price Hike Row
इस गंभीर मामले को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर डॉक्टर अनुज कुमार ने उजागर किया। उन्होंने लिखा कि कैंसर पहले ही करोड़ों परिवारों को तबाह कर चुका है और दवाओं की मनमानी कीमतें हालात को और ज्यादा कठिन बना रही हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि 200 प्रतिशत मार्जिन समझ में आता है, लेकिन 1900 प्रतिशत तक का मार्जिन कैसे जायज ठहराया जा सकता है, वह भी ऐसे समय में जब मरीज और उनका परिवार दवाओं के खर्च से टूट जाता है।
Key Highlights
600 रुपये की कैंसर दवा पैक्लीटैक्सेल 12 हजार रुपये MRP पर बेचने की शिकायत.
सीएम हेमंत सोरेन ने स्वास्थ्य मंत्री और जिलों के उपायुक्तों को जांच का निर्देश दिया.
दवा में 1900% तक मार्जिन का दावा, मरीजों पर भारी आर्थिक बोझ.
Dr. Anuj Kumar ने सोशल मीडिया पर मुद्दा उठाया, कहा करोड़ों परिवार बर्बाद हो रहे.
कीमोथेरेपी दवाइयों के दामों में बड़े अंतर को लेकर सवाल तेज.
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शिकायत सामने आते ही मुख्यमंत्री ने इसे गंभीरता से लिया और स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफान अंसारी के साथ-साथ सभी जिलों के उपायुक्तों को तत्काल जांच करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि दवाइयों की कीमतों में किसी तरह की अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी और जरूरत पड़ने पर सख्त कार्रवाई होगी।
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स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि कई कीमोथेरेपी दवाओं में खरीद और MRP के बीच बड़ा अंतर देखने को मिलता रहा है। मगर 600 रुपये की दवा पर 12,000 रुपये MRP जैसी स्थिति बेहद चिंताजनक है। सरकारी स्तर पर दवा मूल्य नियंत्रण के बावजूद खुदरा बाजार में दामों की मनमानी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।
सरकार ने आश्वासन दिया है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। वहीं मरीजों के परिवारों और स्वास्थ्य अधिकार समूहों ने उम्मीद जताई है कि इस मामले के जरिए दवाओं की मूल्य प्रणाली को लेकर बड़ा सुधार देखने को मिलेगा।
इस पूरे विवाद के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है—कैंसर से लड़ते हुए मरीज सिर्फ बीमारी से नहीं, बल्कि महंगी दवाओं, कर्ज़ों और टूटते भरोसे से भी जूझते हैं। हर बढ़ा हुआ दाम किसी परिवार की नींद, किसी बुजुर्ग की जमा-पूंजी और किसी बच्चे की पढ़ाई को निगल लेता है। इलाज का हक़ किसी की आर्थिक क्षमता पर नहीं टिका होना चाहिए। जब तक दवा की कीमतें इंसानी उम्मीदों से बड़ी रहेंगी, तब तक बीमारी से ज़्यादा व्यवस्था की कठोरता डराएगी।
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