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जलवायु अनुकूल खेती से सुधर रहा मिट्टी का स्वास्थ्य, पोषक तत्वों में बढ़ोतरी

पटना : 2019-20 से राज्य में शुरू हुई जलवायु अनुकूल खेती के बेहतर परिणाम दिखने लगे हैं। आंकड़े बताते हैं कि पांच वर्षों के दौरान मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा 20 फीसदी बढ़ी है। साथ ही, नाइट्रोजन में भी 20 प्रतिशत की वृद्धि पाई गई है। फॉस्फोरस और पोटाश की मात्रा में 10-10 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। बिहार सरकार का कृषि विभाग जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रमों पर तेजी से काम कर रहा है। विभाग का मानना है कि इससे न सिर्फ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में मदद मिलेगी बल्कि कृषि क्षेत्र को टिकाऊ और लाभकारी भी बनाया जा सकता है।

जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम के शुरुआती समय में मिट्टी का पीएच मान 6.25 से 8.48 मापा गया था

जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम के शुरुआती समय में मिट्टी का पीएच मान 6.25 से 8.48 मापा गया थाष वहीं पांच वर्ष बाद इसमें सुधार आया और यह 5 प्रतिशत की कमी के साथ पीएच मान 6.02 से 8.29 दर्ज किया गया है। शून्य जुताई तकनीक एवं फसल अवशेष प्रबंधन का सम्मिलित परिणाम मृदा नाइट्रोजन पर देखा गया है। उपलब्ध नाइट्रोजन की मात्रा में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। फॉस्फोरस में 10 प्रतिशत की वृद्धि के साथ उपलब्ध फॉस्फोरस की मात्रा 17.89 से 45.26 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पाई गई है। जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम से पूर्व पोटाश की मात्रा 78.62 से 312 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी, जो अब 10 प्रतिशत वृद्धि के साथ 82.34 से 350 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पाई गई है।

करीब 65 बिलियन लीटर पानी की हुई बचत

राज्य सरकार ने वर्ष 2019-20 में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर जलवायु अनुकूल खेती की शुरुआत की थी। राज्य के सभी 38 जिलों के 190 गांवों में पूरी तरह जलवायु अनुकूल खेती हो रही है। वर्ष 2019-25 तक कुल 2.63 लाख एकड़ भूमि में खरीफ, रबी एवं गरमा की फसलें उगाई गईं। इससे धान में 48.47 बिलियन लीटर, गेहूं में 8.91 बिलियन लीटर और मक्का में 8.42 बिलियन लीटर पानी की बचत हुई है। साथ ही 6.28 लीटर ईंधन और 316.6 मिलियन राशि श्रम लागत के रूप में बचत हुई है। जलवायु अनुकूल खेती के अंतर्गत 1,892 एकड़ रकबे में हैप्पी सीडर के माध्यम से गेहूं की बुआई, स्ट्रॉ बैलर के माध्यम से 5,577 टन स्ट्रॉ बेल बनाया गया। साथ ही, कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से बायोचार का उत्पादन लगभग 636 टन हुआ, जिसका उपयोग भूमि में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाने के लिए किया गया।

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