देवोत्थान एकादशी : दीर्घ निंद्रा से जगेंगे भगवान, इस दिन से बजेगी शहनाई

देवोत्थान एकादशी : दीर्घ निंद्रा से जगेंगे भगवान, इस दिन से बजेगी शहनाई

पटना : देवोत्थान एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। इस बार एकादशी एक नवंबर को मनायी जायेगी। भगवान विष्णु चार महीने की दीर्घ निंद्रा के बाद जेगेंगे। एकदशी के बाद मांगलिक कार्यों की शुरूआत होती है परन्तु सुर्य के तुला राशि में होने के कारण विवाह आदि का मुहूर्त 21 नवंबर से विवाह का मुहूर्त बनता है। इस वर्ष कुल 11 विवाह के मुहूर्त ही शेष बचे हैं। नवंबर महीने में 21 से 25 तक 29 और 30 नवंबर तक कुल 7 सात दिन है। वहीं दिसंबर में कुल चार दिन 1,4,5 और 6 दिसंबर ही है।

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इसके बाद शुक्र ग्रह 3 फरवरी तक अस्त अवस्था में रहेंगे। विवाह के लिये कारक ग्रह बृहस्पति और शुक्र है। 4 फरवरी से पुन: मांगलिक कार्यों का योग बनेगा।

वर्ष 2026 में बनेगा अधिकमास का योग, अंग्रेजी के लीप ईयर के जैसा है अधिक मास

पडितों के अनुसार अधिमास एक चन्द्र मास है जो गर तीन वर्ष के बाद सौर कैलेंडर में जोड़ा जाता है। जिस तरह अंग्रेजी कैलेंडर में लीप ईयर होता है उसी तरह पंचाग में अधिकमास होता है।अधिकमास को पुरूषोत्तम मास भी कहा जाता है।

पुराणों में प्रसिद्ध है कि भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि को शयन करते हैं और चार मास शयन करने के पश्चात प्रबोधिनी एकादशी को जागते हैं।

भगवान की कृपा भक्तों पर हमेशा होती है फिर भी माना जाता है कि जब विष्णुरूपी सूर्य वर्षाकाल में बादलों से ढक जाते हैं और जब तक मेघों से मुक्त नहीं होते हैं, तब तक चार महीनों का समय भगवान का शयनकाल माना जाता है। इसी को चातुर्मास्य व्रत भी कहते हैं। यह एक प्रकार से अपने भीतर के देवत्व को जगाने का भी समय है।

एकादशी व्रत में क्या करें

प्रबोधिनी एकादशी में श्रद्धा-भक्तिपूर्वक व्रत करते हुए रात्रिकाल में भगवान विष्णु को शयन से जगाने के लिए स्तोत्र पाठ, भगवान की कथाएं पुराण आदि का गायन, भजन शंख, ढोल, नगाड़ा, मृदंग, वीणा तथा अन्य वाद्यों को बजाते हुए किया जाता है।

एकदशी व्रत का फल,जीवन में धन-ऐश्वर्य और सुख,समृद्धि की प्राप्ति 

एकदशी व्रत करने वाले मनुष्य को एक हजार अश्वमेध तथा सौ राजसूय यज्ञ के बराबर फल की प्राप्ति है। अत्यंत दुर्लभ वस्तु की कामना करके यदि कोई निष्ठापूर्वक देवोत्थानी व्रत नियमपूर्वक रात्रि जागरण करते हुए इसका पालन करते हैं उनका यह जीवन सुख, समृद्धि से संपन्न हो जाता है तथा अंत में सदगति की प्राप्ति होती है।

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