गिर गाय और काठियावाड़ी घोड़े के सभी हुये दिवाना, अलास्का की रफ्तार 85 किलोमीटर प्रतिघंटे तो वीरा लगाती है 22 फीट की छलांग
गयाजी: दो गिर गायों से शुरू हुआ सफर सैकड़ो गिर गायों और काठियावाड़ी नस्ल के घोड़े का संरक्षण और संवर्द्धन का केन्द्र बन चुका है। बिहार के गया जी के बृजेंद्र कुमार चौबे का यह जुनून बना चर्चा का कारण।
गुजरात की तरह बिहार में भी महाराणा प्रताप के चेतक की नस्ल के काठियावाड़ी घोड़े का संरक्षण हो रहा है। दो गिर गायों से 235 गिर गाय कर देने वाले बृजेंद्र चौबे अब काठियावाड़ी नस्ल के घोड़े का संरक्षण और संवर्द्धन कर रहे हैं। अभी उनके पास 6 घोड़े हैं। इसमें अलास्का नेशनल हाईवे पर 80 से 85 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ती है तो वीरा 22 की फीट वाली ऊंची छलांग युद्ध जैसी ट्रेनिंग की सब ओर हो रही चर्चा।
इसके मालिक बृजेंद्र चौबे बताते है कि उनके पास पृथ्वीराज और विरुद्ध नाम का घोड़ा है। वही, अलास्का, रोजा, वीरा भीमाक्षी घोङी है। इन सभी की प्रतिदिन युद्ध जैसी ट्रेनिंग होत है और इन घोड़ों की रफ्तार देखते ही बनती है।
गिर गाय के दूध के साथ किशमिश,मुनक्का,अश्वगंधा और शतावरी जड़ी बूटियां हैं इनका भोजन
पशु प्रेमी बृजेंद्र चौबे बताते है कि इनका मेंटेनेंस बहुत ऊंचा है। सभी घोड़े की कुंडली भी बनवा रखी है। बताते हैं, कि उनके घोड़े कीमती गिर गाय का दूध पीते हैं, जिसकी कीमत बाजार में 100 से 150 रुपए प्रति लीटर होती है। महीने में करीब 500 लीटर गिर गाय का दूध यह पीते हैं। इसके अलावा किशमिश, मुनक्का खाते हैं। अश्वगंधा और शतावरी जड़ी बूटियां उनके भोजन में शामिल होती है।
सोनपुर मेले में पहुँचे थे सैकड़ों खरीददार
बृजेंद्र चौबे बताते हैं, कि उनके पास विरुद्ध नाम का घोड़ा है, जो कि करीब 65 इंच लंबा है। 19 महीना का वह बच्चा है। उसे उदयपुर पैलेस से लाया गया है। राजस्थान के उदयपुर राजघराने से लाया गया है। इसकी लंबाई अभी और बढ़ेगी। इसे सोनपुर मेले में ले गए थे। इसकी उम्र का कोई घोड़ा इसका जोड़ा नहीं था। इसे खरीदने वाले सैकड़ो आए, लेकिन उन्होंने इसे नहीं बेचा।
वहीं, गुजरात के जूनागढ़ सेंट्रल फॉर्म से उन्होंने पृथ्वीराज को लाया है। पृथ्वीराज काठियावाड़ी घोड़ा है। यह 9 साल का है। इसकी भी चाल का कोई जोड़ नहीं है। बृजेंद्र चौबे बताते हैं कि उनके पास रेसर घोड़ी अलास्का है। यह 8 साल की है। यह उबड़ खाबड़ स्थानों पर 50 किलोमीटर प्रति घंटा से रफ्तार लगाती है, किंतु नेशनल हाईवे पर जब यह जाती है, तो 80 से 85 किलोमीटर की इसकी रफ्तार हो जाती है। वही रोजा सफेद घोड़ी है। 22 फीट छलांग लगाती है।
लुप्तप्राय इन प्रजातियों का संरक्षण और संवर्धन है उद्देश्य
बृजेंद्र चौबे बताते हैं, कि काठियावाड़ी घोड़ा गुजरात के सौराष्ट्र की नस्ल है। महाराणा प्रताप का चेतक भी काठियावाड़ी नल का था। चेतक के नस्ल की तरह हमारे पास घोड़े-घोड़ियां है। यह फाइटर घोड़े है। युद्ध में सक्षम है, रोजा नाम की घोड़ी ढाल की तरह काम करती है। मैंने अध्ययन किया कि गुजरात से भी काठियावाड़ी नस्ल के घोड़े लुप्त हो रहे हैं। ऐसे में बिहार में इनके संरक्षण और संवर्द्धन पर काम कर रहा हूं।
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आशीष कुमार की रिपोर्ट
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