गोपालगंज : गोपालगंज जिले के युवा लेखिका अमृता सागर की पुस्तक ‘द वेट ऑफ अनसेंट लेटर्स’ पाठकों के बीच तेजी से चर्चा बटोर रही है। यह कृति उन अनकहे शब्दों, अधूरे संवादों और दबे हुए भावों का सजीव दस्तावेज है, जिन्हें लोग जीवन की आपाधापी में लिख तो लेते हैं, पर कभी भेज नहीं पाते। पुस्तक का शीर्षक ही पाठक को ठहरकर सोचने पर मजबूर करता है किक्या तुमने भी कभी ऐसा पत्र लिखा है, जिसे भेजने का साहस नहीं हुआ?
सादगी भरे आवरण और संवेदनशील भाषा के साथ यह पुस्तक पाठक को भीतर झांकने का अवसर देती है
सादगी भरे आवरण और संवेदनशील भाषा के साथ यह पुस्तक पाठक को भीतर झांकने का अवसर देती है। हर पंक्ति टूटे रिश्तों, बीते पलों और उस उम्मीद का आईना बनती है, जो सब कुछ खोने के बाद भी कहीं जीवित रहती है। अमृता सागर की लेखनी किसी घोषणा की तरह नहीं, बल्कि एक फुसफुसाहट की तरह पाठक के मन में उतरती है। वह उन लोगों के लिए लिखती हैं, जो छूट गए उन ‘स्व’ के लिए, जिन्हें समय के साथ पीछे छोड़ दिया गया और उस भविष्य के लिए, जो अब भी प्रतीक्षा में है। लेखिका का मानना है कि सच्चा लेखन उम्र या अनुभव का मोहताज नहीं, बल्कि ईमानदार अनुभूति से जन्म लेता है। उनकी आंखों में दिखने वाला ठहराव और आत्मविश्वास उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट झलकता है।
पुस्तक यह संदेश देती है कि सब कुछ तुरंत ठीक नहीं होता, लेकिन धीरे-धीरे ठीक होना भी एक सुंदर प्रक्रिया है
पुस्तक यह संदेश देती है कि सब कुछ तुरंत ठीक नहीं होता, लेकिन धीरे-धीरे ठीक होना भी एक सुंदर प्रक्रिया है। यह कृति प्रेम, क्षमा, खोने और फिर भी कोमल बने रहने के साहस की कहानी है। अमृता सागर की यह पुस्तक उन सभी के लिए खास है, जिन्होंने कभी दिल से कुछ लिखा, पर उसे भेजने का साहस नहीं जुटा पाए। के बीच तेजी से चर्चा बटोर रही है। यह कृति उन अनकहे शब्दों, अधूरे संवादों और दबे हुए भावों का सजीव दस्तावेज है, जिन्हें लोग जीवन की आपाधापी में लिख तो लेते हैं, पर कभी भेज नहीं पाते। पुस्तक का शीर्षक ही पाठक को ठहरकर सोचने पर मजबूर करता है कि क्या तुमने भी कभी ऐसा पत्र लिखा है, जिसे भेजने का साहस नहीं हुआ? सादगी भरे आवरण और संवेदनशील भाषा के साथ यह पुस्तक पाठक को भीतर झांकने का अवसर देती है।
हर पंक्ति टूटे रिश्तों, बीते पलों और उस उम्मीद का आईना बनती है, जो सब कुछ खोने के बाद भी कहीं जीवित रहती है
हर पंक्ति टूटे रिश्तों, बीते पलों और उस उम्मीद का आईना बनती है, जो सब कुछ खोने के बाद भी कहीं जीवित रहती है। अमृता सागर की लेखनी किसी घोषणा की तरह नहीं, बल्कि एक फुसफुसाहट की तरह पाठक के मन में उतरती है। वह उन लोगों के लिए लिखती हैं, जो छूट गए; उन ‘स्व’ के लिए, जिन्हें समय के साथ पीछे छोड़ दिया गया; और उस भविष्य के लिए, जो अब भी प्रतीक्षा में है। लेखिका का मानना है कि सच्चा लेखन उम्र या अनुभव का मोहताज नहीं, बल्कि ईमानदार अनुभूति से जन्म लेता है। उनकी आंखों में दिखने वाला ठहराव और आत्मविश्वास उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट झलकता है। पुस्तक यह संदेश देती है कि सब कुछ तुरंत ठीक नहीं होता, लेकिन धीरे-धीरे ठीक होना भी एक सुंदर प्रक्रिया है। यह कृति प्रेम, क्षमा, खोने और फिर भी कोमल बने रहने के साहस की कहानी है।
अमृता सागर की यह पुस्तक उन सभी के लिए खास है, जिन्होंने कभी दिल से कुछ लिखा
अमृता सागर की यह पुस्तक उन सभी के लिए खास है, जिन्होंने कभी दिल से कुछ लिखा, पर उसे भेजने का साहस नहीं जुटा पाए। इस सुंदर पुस्तक के युवा लेखिका अमृता सागर जो गोपालगंज जिला के कुचायकोट थाना क्षेत्र के लोहरपट्टी जलालपुर के रहने वाली है। जो अब अपने गांव,घर,जिला ही नहीं इस लेखनी के माध्यम से पूरा बिहार का नाम ग्रवंतित करती है।
यह भी पढ़े : गोपालगंज में दर्दनाक हादसा, अनियंत्रित स्कूल बस झोपड़ी में घुसी, 2 मासूम की मौत, एक महिला जख्मी…
शैलेंद्र कुमार श्रीवास्तव की रिपोर्ट
Highlights


