पश्चिम बंगाल में वामपंथी भद्रलोक स्व. बुद्धदेव भट्टाचार्य का हुआ नेत्रदान, शुक्रवार को होगा देहदान, अकेले पड़े साथी विमान बसु

जनार्दन सिंह की रिपोर्ट

डिजीटल डेस्क : पश्चिम बंगाल में वामपंथी भद्रलोक स्व. बुद्धदेव भट्टाचार्य का हुआ नेत्रदान, शुक्रवार को देहदान के बाद होगी अंत्येष्टि। मौजूदा बंगीय सियासत के भद्रलोक (सज्जन पुरुष) कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री का गुरूवार को देहावसान हो गया। कोलकाता के पाम ऐवन्यू के जिस दो कमरे का फ्लैट ही शुरू से बुद्धदेव भट्टाचार्य के लिए दुनिया हुआ करती थी, आज वहां से वह आखिरी बार निकले लेकिन शव के रूप में। इससे पहले उनका नेत्रदान कराया गया और शुक्रवार को अंत्येष्टि से पहले सियालदह स्थित नील रतन सरकार अस्पताल में उनका देहदान होगा। गुरूवार को पाम ऐवन्यू फ्लैट से जव पूर्व सीएम के निस्तेज शरीर को शव वाहन में रखकर लाल पताके में लपेटा गया तो वहीं वाहन के पीछे दिवंगत भद्रलोक की पत्नी मीरा भट्टाचार्य उसके पीछे हो रहीं। शोकाकुल माहौल में अपनों में उन्हें संभाला और ढांढस दिया तो वह एकटक खड़ी हो गईं और दोनों हाथ जोड़कर दिवंगत बुद्धदेव भट्टाचार्य की ओर शीश नवा दिया। उसके बाद शव वाहन शोकाकुल लोगों के साथ आगे को बड़ा और सजल नयनों से मीरा भट्टाचार्य अपने दिवंगत पति की दुनिया के रूप में मशहूर दो कमरों की फ्लैट की ओर डगमगाते कदमों से लौट गईं।

पत्नी मीरा ने पार्थिव रूप में फ्लैट से विदा होते पति को जोड़े दोनों हाथ, नवाया शीश

दिवंगत भद्रलोक को शव वाहन में देखने को समर्थकों की भारी भीड़ जुट गई थी। वामपंथियों के अलावा बड़ी संख्या में टीएमसी, कांग्रेस और भाजपा के भी लोग पहुंचे हुए थे और हर किसी की संवेदनाएं पूर्व सीएम के शोकाकुल परिवारजनों के प्रति था। खुद सीएम ममता बनर्जी भी पहुंचीं थी और वाममोर्चा के चेयरमैन व सियासी भद्रलोक के अटूट मित्र रहे विमान बसु भी पहुंचे थे। शव वाहन में निस्तेज पड़े भद्रलोक के चेहरे पर दाढ़ी बढ़ी हुई थी जिससे लग रहा कि बीते कुछ दिनों से अस्वस्थता के चलते उन्हेंने शेविंग नहीं की थी। साथ मोटे फ्रेम वाला पावर वाला चश्चा लगा था जो कि सदैव उनकी पहचान भी रही।

सियासत से अलग साहित्य, संस्कृति, संगीत और फिल्म में भी गहरी रुचि वाली बुद्धदेव भट्टाचार्य की एक अलग दुुनिया भी थी। उसी अंदाज वाली एक पुरानी तस्वीर।
सियासत से अलग साहित्य, संस्कृति, संगीत और फिल्म में भी गहरी रुचि वाली बुद्धदेव भट्टाचार्य की एक अलग दुुनिया भी थी। उसी अंदाज वाली एक पुरानी तस्वीर।

सियासी जगत में ख्यात थी भद्रलोक के दो कमरे की दुनिया और चिंतक के रूप में सिगरेट का कश भी

दिवंगत भद्रलोक बुद्धदेव भट्टाचार्य की बंगीय सियासत में सादगी की अलग ही पहचान रही। वह शुरू से ही पाम ऐवन्यू के जिस दो कमरे के फ्लैट में रहते आए, उसमें किताबों, गानों के कैसेट, अखबारों का पसरे रहना विशिष्टता रही। बिस्तर पर बिछे बेडशीट पर सिलवटें भी उसी अनुरूप दिखती थीं और दर्शाती थीं कि सियासत से जुड़ा यह व्यक्ति कला, साहित्य, संस्कृति, संगीत, फिल्म के अलावा खेल को लेकर कितना गंभीर रुचि रखने वाला था। फिल्म निर्माता मृणाल सेन से लेकर  सत्यजीत रे तक की कार्यशैली और विषय वस्तु की गहराइयों पर चिंतकों के बीच देर तक तार्किक विमर्श उनकी आदतों में शुमार था। पार्टी के फुलटाइमर होने के नाते मिलने वाला वेतन ही उनकी आमदनी का मुख्य जरिया था और उसी से वह सिगरेट का कश भी लगाते थे। सियासत में रहकर भी सार्वजनिक जीवन में इस आदत को वह अपनी अहम बुराई मानते थे। ज्योति बसु ने जब राइटर्स बिल्डिंग स्थित सचिवालय के पोडियम में आकर अचानक सन 2000 में कहा कि एक हफ्ते के भीतर के उनके उत्तराधिकारी बुद्धदेव भट्टाचार्य होंगे और आशा व्यक्त की कि उसमें कुछ गंदी आदते हैं जो जल्द सुधार लेंगे। उसके अगले ही दिन दोपहर के समय उसी राइटर्स बिल्डिंग स्थित अपने उप मुख्यमंत्री कक्ष में बैठकर सिगरेट की कश् खींचते हुए बुद्धदेव भट्टाचार्य ने तीन पत्रकारों की मौजूदगी में अपनी इस बुरी आदत का जिक्र किया और अपनी सबसे बड़ी कमजोरी खुद की हिंदी विरोधी छवि होना बताया था। बाद में उन्होंने अपनी इसी छवि को तोड़ने का प्रयास किया और औद्योगिकीकरण करने के फेर में सिंगूर और नंदीग्राम विवाद के बाद वाममोर्चा का किला ही ढह गया था।

पीस वर्ल्ड में रखा गया बुद्धदेव का पार्थिव शरीर, शुक्रवार को विधानसभा में अंतिम दर्शन को रखा जाएगा

पाम ऐवन्यू से गुरूवार को नेत्रदान के बाद निकला पूर्व सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य का पार्थिव शरीर को पीस वर्ल्ड में रखा गया है। शुक्रवार दिन में 11 बजे पार्थिव शरीर को राज्य विधानसभा परिसर में लोगों के अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। वहां से एक घंटे बाद दोपहर करीब 12 बजे पार्थिव शरीर को अलीमुद्दीन स्ट्रीट स्थित माकपा मुख्यालय ले जाया जाएग और अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। अपराह्न 3 बजे वहां से पार्थिव शरीर को एसएफआई और डीवाईएफआई के राज्य मुख्यालय ले जाया जाएगा। दिवंगत बुद्धदेव भट्टाचार्य डीवाईएफआई के संस्थापक महासचिव थे। वहां से पौने 4 बजे जुलूस के रूप में अंतिम यात्रा शुरू होगी और सियालदह के नील रतन सरकार अस्पताल पहुंचेगी। वहां भावी चिकित्सकों के अनुसंधान कार्य हेतु उनका देहदान किया जाएगा। वर्ष 2010 में पूर्व सीएम ज्योति बसु के दिवंगत होने पर भी ऐसी ही प्रक्रिया अपनाई गई थी। वही प्रक्रिया बुद्धदेव कैबिनेट में मंत्री रहे मानव मुखर्जी के निधन पर पार्थिव शरीर के साथ अपनाई गई थी।

बुद्धदेव भट्टाचार्य के निधन के बाद वाममोर्चा को सत्ता लाने वाले सात दोस्तों में अकेले पड़े विमान बसु

पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा के 34 साल का शासन तो सभी को याद है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उसकी बुनियाद जिन सात युवा दोस्तों के बूते पीडीजी के नाम मशहूर रहे सीनियर कामरेड माकपा के दिवंगत राज्य महासचिव प्रमोद दासगुप्त ने रखी थी, उनमें से एक अन्यतम बुद्धदेव भट्टाचार्य भी थे जिनका गुरूवार को कोलकाता में निधन हो गया। यह बात बंगाल की सियासत में 60 के दशक की है। वाममोर्चा को संघर्षशील सियासी संगठन से सत्ताधारी संगठनों का समूह बनाने के लिए पीडीजी ने जिन सात युवा कामरेड को चुना था, उनमें अनिल विश्वास, दिनेश मजूमदार, शंकर गुप्ता, श्यामल चक्रवर्ती, सुभाष चक्रवर्ती, बुद्धदेव भट्टाचार्य एवं विमान बसु शामिल रहे। इन सातों में खासियत यह रही कि संगठन के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगाने के तत्पर रहते, अलग – अलग विषयों पर वैचारिक मतभेद भी रहते लेकिन निजी जीवन में इनके बीच कभी मनभेद नहीं रहा। इनमें से दिनेश मजूमदार की वर्ष 1980 में असामयिक निधन हो गया। उसके बाद सन 1983 में शंकर गुप्ता का अचानक निधन हुआ। फिर माकपा के राज्य महासचिव रहते हुए अनिल विश्वास का 26 मार्च 2006 को निधन हो गया। उनके बाद 3 अगस्त 2009 को कैंसर के चलते सुभाष चक्रवर्ती की मौत हो गई। फिर 6 अगस्त 2020 को श्यामल चक्रवर्ती दिवंगत हो गए। और अब गुरूवार को बुद्धदेव भट्टाचार्य छठें साथी रहे जो दिवगंत हो गए। उसके बाद वाममोर्चा के चेयरमैन के रूप में सांगठनिक कामकाज संभाल रहे विमान बसु अकेले पड़ गए हैं।

कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड की एक पुरानी रैली में तत्कालीन सीएम ज्योति बसु के साथ बुद्धदेव भट्टाचार्य और विमान बसु के बीच गुफ्तगू की फाइल फोटो
कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड की एक पुरानी रैली में तत्कालीन सीएम ज्योति बसु के साथ बुद्धदेव भट्टाचार्य और विमान बसु के बीच गुफ्तगू की फाइल फोटो

बुद्धदेव के निधन की खबर विमान को देने की लोगों को शुरू में हिम्मत नहीं हुई, पता चलते ही भागे दोस्त के घर

गुरूवार की सुबह कोलकाता के अलीमुद्दीन स्ट्रीट स्थित माकपा राज्य मुख्यालय के दूसरे तल पर स्थित अपने कमरे में वाममोर्चा के चेयरमैन विमान बसु अखबारों को पढ़ने में मशगूल थे। तभी माकपा राज्य मुख्यालय में पूर्व सीएम के निधन की खबर पहुंच गई लेकिन वहां मौजूद लोगों में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वह उसकी जानकारी विमान बाबू को दें क्योंकि लोगों को डर था कि उम्रदराज हो चुके विमान बसु को यह संदेश सदमा ना पहुंचा दे। अचानक उन्हें यह शॉकिंग न्यूज सुनाने की बजाय पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं को इसकी जिम्मेदारी दी गई तो आवश्यक सांगठनिक कामकाज के बहाने मिलने पहुंचें और उसी वार्ताक्रम में बुद्धदेव के दिवंगत होने की सूचना दी तो तुरंत विमान बसु नीचे उतरे और पार्टी की बोलेरो गाड़ी से सीधे पाम ऐवन्यू स्थित पूर्व सीएम के आवास पहुंचे। अपने छठें साथी को पार्थिव शरीर के रूप में पड़ा देख विमान बसु के चेहरा उतर गया। कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं थे। जैसे-तैसे खुद को संभालते हुए दिवंगत साथी को लाल सलाम किया और फ्लैट से बाहर निकले। मीडिया वाले स्वभाववश उनकी ओर लपके तो भी निराश व कातर स्वर में विमान बसु बोले – ‘बैठी हालत से उठने में कष्ट हो रहा था। क्या कहूं, मेरा दोस्त चला गया। बात कर पाने की स्थिति में नहीं हूं। प्लीज, कुछ भी नहीं कहना चाहता।’ फिर उसी बोलेरो गाड़ी में आगे वाली ड्राइवर के बाईं ओर की सीट पर डबडबाईं आंखों के साथ बैठकर अलीमुद्दीन स्ट्रीट को रवाना हो गए।

माकपा के उन सात साथियों के सियासी संघर्ष की गाथा एकनजर में  

भाकपा से अलग हुए माकपा को मजबूत सियासी संगठन बनाने के लिए 60 के दशक में राज्य महासचिव प्रमोद दासगुप्ता (पीडीजी) ने जिन सात युवा दोस्तों को चुन कर आगे बढ़ाया, उन्हें एक के बाद एक कई अहम काम सौंपें और जिम्मेदारियां दीं। माकपा ने तब गणतांत्रिक युवा फेडरेशन (डीवाईएफआई) के नाम से युवा संगठन बनाया जिसमें संस्थापक महासचिव बनाए गए बुद्धदेव भट्टाचार्य और अध्यक्ष बनाए गए दिनेश मजूमदार जबकि शेष पांचों को एसएफआई में जिम्मेदारियां दी गईं थीं। तब 60 और 70 के दशक में सियासी उथल-पुथल के बीच इन सात युवाओं ने अपने संगठन के लिए सियासी जमीन तैयार की और उसके लिए दिनरात एक कर दिया। आखिरकार सफलता भी हाथ आती दिखी तो सत्ता पर काबिज होने के लिए समान विचारधाराओं वाले वामपंथी छोटे-बड़े संगठनों को बड़े लक्ष्य के लिए एकजुट करने में भी पीछे नहीं हटे। फिर तो सत्ता में आने के बाद चुनाव पूर्व किए गए भूमि सुधार आंदोलन वाले वादे को अमलीजामा पहनाया। नतीजा यह हुआ कि गली-मोहल्ले में माकपा की लोकल कमेटियों में पंचायतें लगने लगीं तो सत्ता की जड़े ऐसी जमीं कि तीन दशक तक उसे कोई डिगा नहीं पाया।

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