Ranchi-कांके स्थित बदलाव संस्थान में आदिवासी-मूलवासी समुदाय के परिप्रेक्ष्य में संविधानिक मूल्यों पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला को संबोधित करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता फिलिप कुजूर ने कहा कि सरकारें आज भी खनन और दूसरी बड़ी परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण अंग्रेजों द्वारा 1894 में निर्मित के तहत करती है. इस कानून में सिर्फ मुआवजा की बात कही गयी है,
जबकि 2013 में निर्मित कानून में पुनर्वास के साथ पर्यावरणीय संरक्षण की भी गारंटी दी गई है. 1894 का भूमि अधिग्रण कानून सरकारों के लिए वर्तमान कानूनों की अपेक्षा कई गुना फायदेमंद है.
समता, समानता, न्याय और बंधुता हमारे संविधान की बुनियाद
बतौर मुख्य प्रशिक्षक सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व राज्य सलाहकार सदस्य बलराम जी ने कहा कि समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता की बुनियाद पर हमारा संविधान बना है, और ये मूल्य दुनिया के किसी भी देश और मानव समाज के केन्द्रीय मूल्य हैं.
संविधानिक मूल्य आम तौर पर दिखाई नहीं पड़ते, लेकिन उनसे उपजे हक़ अधिकार और जिम्मेवारियाँ दिखाई पड़ती हैं. संविधानिक मूल्यों से ही मौलिक अधिकार, सरकारी आदेश और कानून बनाये जाते हैं.

आदिवासी-मूलवासी चिंतक सुनील मिंज ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने संविधान में पांचवी और छठी अनुसूची का प्रावधान किया है. इसे संविधान के अन्दर आदिवासी क्षेत्रों के लिए मिनी संविधान का दर्जा प्राप्त है. इसके तहत आदिवासी इलाकों में व्यापक अधिकार मिले हैं. ग्राम सभाओं को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों अधिकार प्राप्त हैं. अब ग्राम सभाओं को तीसरी सरकार का दर्जा प्राप्त है.
साथ ही इस अनुसूची के तहत् राज्य के राज्यपालों और आदिवासी सलाहकार परिषद् को भी भारतीय संविधान ने असीमित अधिकार प्रदान दिया है. इसी परिपेक्ष्य में 1996 में पेसा कानून भी भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया. लेकिन अत्यंत ही दुर्भाग्य है कि राज्य सरकार ने ढाई दशक बाद भी पेसा नियमावली बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.
संविधानिक मूल्यों को प्राप्त करने की दिशा में व्यापक कदम उठाया जाना शेष
सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज ने कहा, भारतीय संविधान में प्रदत्त अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों को ध्यान में रखते हुए सरकारें नागरिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए कानून और नीतियाँ निर्धारित करती हैं.
हाल के दशकों में भारतीय संसद द्वारा पारित अधिकार आधारित कानून यथा सूचनाधिकार कानून, महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून, वनाधिकार कानून, शिक्षा का अधिकार कानून और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून आदि, लेकिन नागर समाज का मानना है कि संविधान में प्रदत्त अधिकारों और कर्तब्यों के अनुपात में ये कानून महज उस दिशा में उठाये गए चंद सांकेतिक पहल हैं. इसमें संविधानिक मूल्यों को प्राप्त करने की दिशा में व्यापक कदम उठाया जाना शेष है.
वन विभाग अतिक्रमण के नाम पर ग्रामीणों को झूठे मुकादमें में फंसा रही
एनसीडीएचआर के राज्य संयोजक मिथिलेश कुमार ने प्रभागियों को वनाधिकार कानून 2006 की जानकारी देते हुए कहा कि यह कानून देश का प्रगतिशील कानून जरुर है. लेकिन सरकारों इसे ईमानदारी पूर्वक लागू नहीं कर रही हैं. राज्य स्तर पर निगरानी समिति जिसके अध्यक्ष स्वयं मुख्यमन्त्री हैं, पुनर्गठन नहीं किया गया है. बल्कि उल्टे वन विभाग आज धड़ल्ले से देश की आजादी के पूर्व का 1922 के नक़्शे के आधार वनों का सीमांकन कर रही है.
इससे कई ग्रामवासियों को अतिक्रमण के नाम पर झूठे मुकदमों में फंसाया जा रहा है. गढ़वा जिले में तो अधिकारियों ने हद ही कर दी है. वहां दर्जनभर लोगों को सामुदायिक अधिकार को भी व्यक्तिगत पट्टे की तरह वितरण किया गया. यहां ग्राम सभा को झुनझुना थमा दिया गया. अनुमंडल और जिला स्तरीय समितियां बगैर किसी प्रक्रिया और दावे के बिजली ग्रिड और दूसरी कंपनियों को अपने उपक्रम स्थापित करने के लिए वनाधिकार पट्टा कर दिया. इसके लिए जरुरी है कि ऐसे अधिकारियों पर एट्रोसिटी एक्ट के तहत् प्राथमिकी दर्ज करवायी जाय.
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