रांचीः दीपोत्सव पर दीप प्रज्वलित कर अंधियारा मिटाने की कोशिश हमारी पुरातन संस्कृति रही है. इस बार भी हम अपनी इस पुरातन संस्कृति का निर्वाह करेंगे. लेकिन अंधकार से उजाले के इस पुरातन संघर्ष में एक अदद दीप की भी जरुरत होती है. लेकिन, कोरोना महामारी के कारण लगे लॉकडाउन ने पीढ़ियों से दीप का निर्माण कर रहे कुम्भकारों के जीवन में अंधियारा पसार दिया है.

दरअसल दो वर्षों का लम्बा लॉकडाउन से बाजार अभी भी उबर नहीं पाया है, बाजार की कमर पूरी तरह टूट चुकी है. बात करें कुम्भकारों की तो लॉकडाउन की मार और बाजार की मंदी से उनके जीवन में घनधोर अंधेरा पसरा है.
हां, एक बात जरुर है कि दीप महोत्सव की आस से उनके मन में एक उम्मीद की किरण जगी है, कमाई की आस जागी है और इसी के साथ कुम्भकार दीपावली की तैयारियों में जुट गए हैं.
अगढ़ मिट्टी से दिया बनाने से लेकर कई कलात्मक चीजें बनाई जा रही है. पूरा परिवार पूरे मनोयोग से काम-धंधे में जुट गया है. हालांकि, इस बार मांग ठीक रहने की उम्मीद है, लेकिन कुम्भकारों के चेहरे पर थोड़ी मायूसी जरुर है. बाजार का आलम क्या होगा, इसको लेकर सशंकित है, मन में तरह-तरह की आशंका है.

नाचते चाक की तरह पुश्तैनी काम के इर्द-गिर्द ही घूम रही है कुम्भकारों की जिन्दगी
कुम्भाकार बताते हैं कि चाक पर मिट्टी को अपने पुस्तैनी हुनर से तरह-तरह की आकृति में ढ़ालने वाले कुम्हारों की जिंदगी नाचते चाक की तरह पुश्तैनी काम के इर्द-गिर्द ही घूम रही है. यही कारण है कि कुम्भाकारों की नई पीढ़ी अपने परंपरागत व्यवसाय से हटकर मजदूरी और अन्य कामों की ओर उन्मुख हुई है. चिरौन्दी, रांची की रहने वाली एक महिला कुम्भाकार बताती हैं कि उनके परिवार और समाज ने लॉकडाउन बनी आर्थिक संकट झेला है. इस दीपावली से कुछ उम्मीद जगी है. वैसे भी जब दीपावली आती है तब ही कुछ कमाई होती है.
रिपोर्टः करिश्मा
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