रेजांगला की अमर गाथा: 1962 India China War में मेजर शैतान सिंह और 124 जवानों की शहादत की कहानी

1962 के India China War में लद्दाख के रेजांगला दर्रे पर मेजर शैतान सिंह और 124 भारतीय जवानों ने कैसे 3000 चीनी सैनिकों को रोका, पढ़िए पूरी कहानी।


1962 India China War रांची: 27 जनवरी 1963 की शाम दिल्ली का नेशनल स्टेडियम। मंच पर लता मंगेशकर थीं और दर्शक दीर्घा में राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू मौजूद थे। जैसे ही लता जी ने गाया — ऐ मेरे वतन के लोगों, पूरा स्टेडियम भावनाओं से भर उठा। शायद ही कोई आंख सूखी रही हो।

विडंबना यह थी कि जिन शहीदों की कुर्बानी को याद करते हुए यह गीत गाया जा रहा था, उनमें से कई की कहानी अब तक देश से छिपी हुई थी। यह कहानी थी लद्दाख के 18 हजार फीट ऊंचे रेजांगला दर्रे की, जहां 1962 के युद्ध में भारतीय सैनिकों ने इतिहास की सबसे साहसी लड़ाइयों में से एक लड़ी।


1962 India China War :रेजांगला में कैसे सामने आई शहादत की कहानी

भारत चीन युद्ध के खत्म होने के कई महीने बाद फरवरी 1963 में, जब लद्दाख की बर्फ पिघलनी शुरू हुई, तब एक स्थानीय गड़रिया संयोग से रेजांगला पहुंचा। वहां का दृश्य भयावह था। बर्फ में दबे 113 भारतीय सैनिक, जिनके हाथों में अब भी बंदूकें थीं और शरीर पर पट्टियां बंधी हुई थीं। ऐसा लग रहा था मानो वे अब भी मोर्चे पर डटे हों।

हालांकि रेजांगला से लौटे कुछ सैनिक पहले ही इस लड़ाई की कहानी सुना चुके थे, लेकिन किसी ने उस पर भरोसा नहीं किया। 124 जवानों का 3000 चीनी सैनिकों को रोक देना असंभव सा लगता था। लेकिन बर्फ के नीचे दबी यह सच्चाई अब देश के सामने आने वाली थी।

1962 India China War :18 नवंबर 1962: जब रेजांगला में इतिहास लिखा गया

18 नवंबर 1962 की सुबह। लद्दाख में कड़ाके की ठंड, तेज बर्फीली हवाएं और सूरज अब तक ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाया था। चुशूल सेक्टर में 13 कुमाऊं बटालियन की सी कंपनी तैनात थी, जिसकी कमान मेजर शैतान सिंह के हाथों में थी।

सुबह होते ही चीन की ओर से हलचल दिखी। रोशनी के गोले भारतीय चौकियों की ओर बढ़ते नजर आए। बाद में पता चला कि ये लालटेन थीं, जिन्हें याक के गले में बांधकर भारतीय सैनिकों को भ्रमित करने के लिए भेजा गया था।

भारतीय जवानों के पास सीमित हथियार थे। पुराने राइफल, सीमित गोलियां, कुछ एलएमजी और मोर्टार। ऊंचाई पर लड़ने का अनुभव नहीं, ठंड से बचने के लिए पर्याप्त कपड़े भी नहीं। लेकिन एक चीज भरपूर थी — अपने कमांडर पर भरोसा और देश के लिए मर मिटने का जज्बा।

1962 India China War :मेजर शैतान सिंह का नेतृत्व और आखिरी फैसला

हमले के पहले दौर में भारतीय जवानों ने चीनी सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। लेकिन मेजर शैतान सिंह समझ चुके थे कि दुश्मन उनके गोला बारूद खत्म होने का इंतजार कर रहा है। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों से मदद मांगी, लेकिन जवाब मिला कि सहायता तुरंत नहीं पहुंच सकती और जरूरत पड़े तो चौकी छोड़कर पीछे हट सकते हैं।

मेजर शैतान सिंह ने पीछे हटने से इनकार कर दिया। उन्होंने जवानों से कहा कि जो जाना चाहे जा सकता है, लेकिन वह आखिरी सांस तक लड़ेंगे। पूरी टुकड़ी उनके साथ खड़ी रही। निर्णय हुआ — आखिरी आदमी, आखिरी गोली तक लड़ाई।


Key Highlights

  1. 1962 India China War में रेजांगला की लड़ाई सबसे भीषण मुठभेड़ों में शामिल

  2. 124 भारतीय जवानों ने 3000 चीनी सैनिकों को रोका

  3. मेजर शैतान सिंह ने घायल होने के बाद भी मोर्चा नहीं छोड़ा

  4. फरवरी 1963 में बर्फ पिघलने पर सामने आई शहादत की सच्चाई

  5. मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया


1962 India China War :जब वीरता ने असंभव को संभव कर दिखाया

चीनी सेना की एमएमजी भारतीय पोजीशनों पर भारी पड़ रही थी। तभी दो भारतीय जवान, गुलाब सिंह और सिंह राम, जान की परवाह किए बिना एमएमजी को नष्ट करने आगे बढ़े। गोलियों की बौछार में गुलाब सिंह शहीद हो गए, लेकिन सिंह राम आगे बढ़ते रहे और दुश्मन की गन तक पहुंचने की कोशिश करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

इस बीच मेजर शैतान सिंह खुद भी गंभीर रूप से घायल हो चुके थे। जब सैनिक उन्हें इलाज के लिए पीछे ले जाना चाहते थे, तो उन्होंने इनकार कर दिया। दोनों हाथ जख्मी होने के बावजूद उन्होंने एक मशीन गन मंगवाई और उसके ट्रिगर को रस्सी से अपने पैर से बांधकर फायरिंग जारी रखी। यही उनकी आखिरी लड़ाई थी।

1962 India China War :शहादत के बाद मिला सम्मान

रेजांगला की लड़ाई में 124 भारतीय जवान शहीद हुए। चीनी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा। भारतीय आंकड़ों के अनुसार 1300 चीनी सैनिक मारे गए, जबकि चीन ने भी बाद में माना कि उसे सबसे अधिक नुकसान रेजांगला में ही हुआ।

मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार जोधपुर में पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया। रेजांगला की यह लड़ाई आज भी भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे प्रेरणादायक गाथाओं में गिनी जाती है।

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