झारखंड में कांग्रेस का ‘दलित कार्ड’: एससी आयोग से लेकर जातीय संवाद तक, क्या बदलेगा वर्षों पुराना राजनीतिक समीकरण?

रांची: झारखंड की सियासत में अब कांग्रेस एक नई पटकथा लिखने की कोशिश में है, जिसकी धुरी राज्य की करीब 50 लाख दलित आबादी है। राजनीतिक जनाधार की जंग में पिछड़ चुकी कांग्रेस अब दलितों को केंद्र में रखकर सामाजिक और राजनीतिक संतुलन को फिर से अपने पक्ष में करने की रणनीति बना रही है। पार्टी की हालिया गतिविधियां इस ओर स्पष्ट इशारा करती हैं कि अब वह ‘दलित राजनीति’ को केवल नारों तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि जमीनी स्तर पर उसका विस्तार करना चाहती है।

एससी आयोग गठन और संवाद का अभियान

हाल ही में रांची में आयोजित विशेष बैठक में कांग्रेस ने राज्य में शीघ्र अनुसूचित जाति आयोग गठित करने, एससी परामर्शदात्री समिति को 6 माह में सक्रिय करने और गांव-गांव दलित संवाद यात्रा शुरू करने का प्रस्ताव पारित किया। इस बैठक में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, प्रभारी के. राजू, एससी विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम और वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर जैसे वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। कांग्रेस नेताओं ने दलित जीवनशैली, समस्याओं और उनके समाधान को लेकर केंद्रित चर्चा की।

मंत्रालयों के जरिए योजनागत लाभ पहुंचाने की कोशिश

राज्य सरकार में कांग्रेस के पास वित्त, स्वास्थ्य, कृषि और ग्रामीण विकास जैसे अहम मंत्रालय हैं। पार्टी की योजना है कि इन विभागों की योजनाओं के माध्यम से दलित समाज को लाभ देकर ‘नीति का श्रेय और वोट का लाभ’ एक साथ लिया जाए। यह रणनीति दलित समुदाय के बीच कांग्रेस की साख फिर से स्थापित करने की एक बड़ी कवायद मानी जा रही है।

जातीय गणना, सरना धर्मकोट और ओबीसी आरक्षण: व्यापक सामाजिक गठजोड़ की ओर

दलितों के साथ-साथ कांग्रेस झारखंड में ओबीसी और आदिवासियों के बीच भी अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। जातीय जनगणना की मांग को पार्टी ने लगातार उठाया है और इसे राहुल गांधी के दबाव की जीत बताया। इसी क्रम में आदिवासियों के लिए सरना धर्मकोट की मांग को लेकर कांग्रेस ने 26 मई को राजभवन के सामने प्रदर्शन किया, जिससे झामुमो को भी जवाबी प्रदर्शन करना पड़ा। साथ ही पार्टी ओबीसी के लिए 27% आरक्षण की मांग पर भी जोर दे रही है।

दलित जनसंख्या, योजनाएं और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में अनुसूचित जातियों की आबादी लगभग 39.8 लाख थी, जो अब बढ़कर 50 लाख के आसपास मानी जा रही है। इनमें पासवान, चमार, धोबी, कोरी, मुसहर और भोक्ता प्रमुख जातियां हैं। राज्य में दलितों के लिए मुख्यमंत्री अनुसूचित जाति सशक्तिकरण योजना, अंबेडकर आवास योजना, डॉ. अंबेडकर छात्रवृत्ति, और अनुसूचित जाति उद्यमिता विकास योजना जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में उन्हें 10% आरक्षण भी प्राप्त है।

झारखंड में कांग्रेस का दलित जनाधार और पिछला ट्रैक रिकॉर्ड

झारखंड बनने के बाद कांग्रेस शुरुआती वर्षों में सत्ता में तो रही, लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा और अन्य क्षेत्रीय दलों की छाया में इसका अस्तित्व सिमटता गया। दलितों के बीच भी कांग्रेस का प्रभाव घटा। राज्यसभा चुनाव और राष्ट्रपति चुनाव जैसे अवसरों पर कांग्रेस की भूमिका हाशिए पर दिखी। वहीं, 2005 के बाद से पार्टी ने कोई स्पष्ट दलित नेतृत्व नहीं उभारा, जिससे उसका सामाजिक आधार और कमजोर हुआ।

क्या कांग्रेस का यह ‘दलित कार्ड’ रंग लाएगा?

अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस की यह नई रणनीति उसे राज्य की सत्ता में निर्णायक स्थिति दिला पाएगी? क्या गांव-गांव जाकर दलित संवाद और योजनाओं के लाभ से पार्टी वह भरोसा हासिल कर सकेगी जो दो दशकों में खो चुका है? विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक मुहावरे बदलने के लिए केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि ठोस ज़मीनी परिणाम जरूरी होंगे।

समय ही बताएगा कि कांग्रेस की यह आक्रामक और समावेशी दलित राजनीति झारखंड में केवल शोर बनकर रह जाती है या वास्तव में वह नया राजनीतिक समीकरण रच पाती है।

 

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