घाटशिला की राजनीतिक संग्राम: एक नया अध्याय

घाटशिला: घाटशिला विधानसभा क्षेत्र, जहां चुनावी प्रतिस्पर्धा हर बार एक नया रोमांच लाती है, इस बार फिर से सुर्खियों में है। यहां भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के पुत्र बाबूलाल सोरेन को मैदान में उतारकर मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। चंपाई सोरेन, जो खुद एक अनुभवी नेता हैं, अब अपने बेटे की चुनावी यात्रा में पूरी ताकत झोंकने के लिए तैयार हैं। उनका उत्साह साफ है: “यह केवल बेटे का चुनाव नहीं, परिवार की प्रतिष्ठा का सवाल है।”

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वहीं, झामुमो के रामदास सोरेन भी इस बार अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं। पांच बार चुनाव लड़ने का अनुभव उनके पक्ष में है। लेकिन बाबूलाल की यह पहली बार है, और यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह अपने पिता की छाया से बाहर निकलकर अपनी पहचान बना पाएंगे।

यहां के संथाल मतदाता इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं। दोनों उम्मीदवार संथाली होने के कारण, वोटों का बंटवारा एक बड़ा प्रश्न बन गया है। पिछले चुनावों में जीत-हार का अंतर हमेशा ही तंग रहा है—8000 वोटों से कम। इस बार भी ऐसा ही कुछ होने की संभावना है।

महिला मतदाता इस क्षेत्र में निर्णायक साबित हो रही हैं। घाटशिला में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक है, और वे हर बार चुनाव का नतीजा बदलने में सक्षम रही हैं। इस बार उनका रुख यह तय करेगा कि बाबूलाल सोरेन की राजनीतिक पारी शुरू होगी या रामदास सोरेन फिर से अपनी जीत का जश्न मनाएंगे।

सभी की नजरें अब चुनावी परिणाम पर हैं। क्या बाबूलाल अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा पाएंगे, या रामदास सोरेन अपने अनुभव के बल पर बाजी मार लेंगे? घाटशिला की राजनीति में इस बार का चुनाव एक नया मोड़ लाने की क्षमता रखता है। हर कोई इस नाटक के अगले अंक का इंतजार कर रहा है।

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