गढ़वा: विधानसभा क्षेत्र में चुनावी समर पूरी तरह से रोमांचक मोड़ पर पहुंच चुका है। पिछले चार विधानसभा चुनावों में चार अलग-अलग पार्टियों को जीत मिल चुकी है, जिससे इस सीट की राजनीतिक अहमियत और बढ़ गई है। 2019 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के मिथिलेश ठाकुर ने अपनी जीत से सबको चौंका दिया, क्योंकि यह झामुमो की इस सीट पर पहली जीत थी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे इस बार अपनी स्थिति बनाए रख पाएंगे या फिर भाजपा की सत्येंद्रनाथ तिवारी का जादू फिर से चलने वाला है?

गढ़वा का चुनावी इतिहास भी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रहा। 2005 में राजद के गिरिनाथ सिंह, 2009 में झाविमो के सत्येंद्रनाथ तिवारी और 2014 में भाजपा के टिकट पर सत्येंद्रनाथ तिवारी ने जीत दर्ज की थी। लेकिन 1980 के बाद से कांग्रेस यहां एक बार भी सत्ता में नहीं आ पाई, जबकि भाजपा और राजद की जंग में गढ़वा कई बार झूलता रहा। झामुमो की जीत ने यहां की राजनीतिक सूरत को नया मोड़ दिया है, लेकिन इस बार खेल त्रिकोणीय हो चुका है। राजपरिवार से आने वाले गिरिनाथ सिंह अब समाजवादी पार्टी (सपा) के टिकट पर मैदान में हैं, जिससे मुकाबला और भी दिलचस्प बन गया है।

इसी तरह, भवनाथपुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के भानुप्रताप शाही और झामुमो के अनंतप्रताप देव के बीच कड़ी टक्कर है। पिछले चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में तीसरे स्थान पर रहे अनंत को इस बार अपनी ताकत दिखाने का एक और मौका मिला है। वहीं, बसपा की सोगरा बीबी का इस बार चुनावी मैदान में ना उतरना भाजपा के लिए एक राहत की बात हो सकती है, लेकिन झामुमो के पक्ष में अल्पसंख्यक वोटों का शिफ्ट होने का खतरा उनके लिए सिर पर मंडरा रहा है।

राजनीति की इस जंग में एक बात साफ है—गठबंधन और वोटों का ध्रुवीकरण इस बार बड़े खेल का हिस्सा बन सकते हैं। जहां एक ओर झामुमो अपनी पकड़ी मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, वहीं भाजपा और सपा अपनी रणनीतियों से स्थिति को बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। चुनावी नतीजे किस दिशा में जाएंगे, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन गढ़वा की राजनीति का ये व्यंग्य बेशक राजनीति के जिज्ञासु दर्शकों के लिए एक दिलचस्प अध्याय बनने वाला है।


















