रांची: झारखंड के विभिन्न शहरों में आज छठ महापर्व का चौथा और अंतिम दिन धूमधाम से मनाया गया। श्रद्धालुओं ने उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर इस महापर्व का विधिवत समापन किया। राज्य के पवित्र नदियों और सरोवरों के घाटों पर आस्था का ऐसा नजारा देखने को मिला, जो किसी महायज्ञ से कम नहीं था। व्रती महिलाओं के साथ उनके परिजन भी सुबह से ही घाटों पर जुटे हुए थे। इस अवसर पर घाटों पर आतिशबाजी, लोकगीतों की गूंज और भक्तिमय वातावरण ने पर्व के उल्लास को और बढ़ा दिया।
छठ पूजा अपने आप में बेहद कठिन व्रत माना जाता है। यह पर्व पूरी श्रद्धा और कठोर नियमों का पालन करते हुए मनाया जाता है। व्रती महिलाएं 36 घंटे का निर्जला उपवास रखती हैं, जिसमें जल तक का सेवन नहीं किया जाता। इस पर्व में छठी मैया और भगवान भास्कर की आराधना की जाती है। मान्यता है कि उनकी कृपा से परिवार में सुख, समृद्धि और संतान की लंबी उम्र का आशीर्वाद मिलता है।
तीसरे दिन व्रतियों ने डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया, जबकि आज चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही व्रत का पारण किया गया। झारखंड में सुबह 6:30 बजे सूर्योदय का समय निर्धारित था। हालांकि, कोहरे के कारण सूर्यदेव के दर्शन में थोड़ी देर हुई, लेकिन इस दौरान श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं आई। निर्धारित समय पर ही अर्घ्य देने की प्रक्रिया शुरू हो गई।
राज्य के हर कोने में छठ महापर्व को लेकर खासा उत्साह देखा गया। विभिन्न शहरों के घाटों पर लाखों की संख्या में श्रद्धालु इकट्ठा हुए। सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के लिए प्रशासन ने व्यापक इंतजाम किए थे। घाटों पर बैरिकेडिंग और पुलिस बल की तैनाती के बावजूद श्रद्धालुओं का जनसैलाब घाटों पर उमड़ पड़ा।
व्रतियों के परिजन सूप और पूजन सामग्री लेकर घाट तक पहुंचे। सूप में ठेकुआ, फल, और अन्य पूजन सामग्री रखी गई, जिसे व्रती महिलाओं ने सूर्यदेव को अर्पित किया। इस दौरान आस्था और श्रद्धा की कई अनोखी तस्वीरें भी सामने आईं।
छठ महापर्व लोक आस्था का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। यह पर्व प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है। जलाशयों के किनारे आयोजित होने वाले इस पर्व में श्रद्धालु अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पूरी तरह प्राकृतिक सामग्री का ही उपयोग करते हैं। इस पर्व की एक खास बात यह है कि यह बाजारवाद से पूरी तरह मुक्त है।
मान्यता है कि छठ पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में हर अस्त के बाद उदय निश्चित है। यह पर्व न केवल हमें आस्था और श्रद्धा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, बल्कि परिवार और समाज के बीच सामूहिक एकता का संदेश भी फैलाता है।
छठ केवल बिहार या झारखंड का पर्व नहीं है, बल्कि इसे देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले सनातन धर्मावलंबी पूरे जोश और श्रद्धा के साथ मनाते हैं। खासकर नवजात शिशु के जन्म के छठे दिन होने वाली छठी पूजा का संबंध भी इसी छठी मैया से जोड़ा जाता है।
आज उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही इस महापर्व का समापन हुआ। घाटों पर उमड़े जनसैलाब और भक्तिमय माहौल ने यह साबित कर दिया कि आस्था का यह पर्व हर दिल में गहराई तक समाया हुआ है। छठ महापर्व ने एक बार फिर से झारखंड के घाटों पर आस्था, संस्कृति और परंपरा का अनूठा संगम प्रस्तुत किया।


















