‘राजनीतिक स्वार्थ की भेंट चढ़ा महिलाओं के हक में एक ऐतिहासिक सुधार की कोशिश’

पटना : भारत जैसे प्राचीन लोकतांत्रिक परंपराओं वाले देश के सामने जब भी सामाजिक न्याय और समानता को मजबूत करने का अवसर आता है, तब यह केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का समय होता है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम‘ भी ऐसा ही एक ऐतिहासिक अवसर था। एक ऐसा प्रयास, जिसका उद्देश्य देश की आधी आबादी, यानी महिलाओं को नीति-निर्धारण की मुख्यधारा में सशक्त भागीदारी देना था। यह सिर्फ एक बिल नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को और अधिक समावेशी बनाने की एक दूरदर्शी और सकारात्मक पहल थी।

सरकार ने इस अधिनियम को एक ‘महायज्ञ’ बता रही थी जिसमें देश की हर महिला की आकांक्षाएं, सम्मान और अधिकार जुड़े हुए थे

सरकार ने इस अधिनियम को एक ‘महायज्ञ’ बता रही थी जिसमें देश की हर महिला की आकांक्षाएं, सम्मान और अधिकार जुड़े हुए थे। मकसद था महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में उनका उचित प्रतिनिधित्व दिलाना, ताकि वे केवल मतदाता ही नहीं, बल्कि नीति-निर्माता भी बन सकें।  लेकिन, यह ऐतिहासिक सुधार विपक्ष के राजनीतिक स्वार्थ की भेंट चढ़ गया जो न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि आधी आबादी की नजरों में अक्षम्य भी।

सरकार ने इस बिल को लाते समय स्पष्ट किया था कि यह किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे देश का मुद्दा है

सरकार ने इस बिल को लाते समय स्पष्ट किया था कि यह किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे देश का मुद्दा है। यहां तक कि पीएम मोदी ने संसद में विपक्ष से यह भी कहा कि वे चाहें तो इसका पूरा क्रेटिड ले सकते हैं क्योंकि उद्देश्य महिलाओं का सशक्तिकरण था।  लेकिन विपक्ष ने इसे राजनीतिक नजरिये से देखा, महिला सशक्तिकरण की आड़ में परिसीमन को सरकार की बड़ी साजिश बताया और बिल को पास नहीं होने दिया। देश में पिछले एक दशक में महिलाओं के जीवन स्तर को सुधारने के लिए सरकार ने कई ठोस कदम उठाए हैं। चाहे वह स्वच्छता अभियान को, गैस कनेक्शन हो, बैंकिंग सुविधाएं हो या आवास की बात हो।

सरकारी की कई और पहल ने महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का काम किया है

सरकारी की कई और पहल ने महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का काम किया है। और नारी शक्ति वंदन अधिनियम उसी यात्रा का स्वाभाविक और आवश्यक अगला कदम था, जो महिलाओं को निर्णय लेने के सर्वोच्च मंच तक पहुंचाने का मार्ग खोलता। दुर्भाग्य से, जब देश को एकजुट होकर इस ऐतिहासिक कदम का समर्थन करना चाहिए था, तब विपक्ष ने एक बार फिर राजनीतिक स्वार्थ को राष्ट्रीय हित से ऊपर रखा। विपक्ष का रवैया हमेशा से दोहरा दिखाई देता रहा है। वे सार्वजनिक रूप से इस बिल के समर्थन की बात करते हैं, लेकिन हर बार एक लेकिन जोड़ देते हैं। इस बार भी उन्होंने तकनीकी और क्षेत्रीय मुद्दों का सहारा लेकर असली मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश की।

इतिहास इस बात का गवाह है कि विपक्ष ने बार-बार महिला आरक्षण के प्रयासों को विफल किया है

आपको बता दें कि इतिहास इस बात का गवाह है कि विपक्ष ने बार-बार महिला आरक्षण के प्रयासों को विफल किया है। 1996 में पहली बार पेश किया गया बिल अधूरा रह गया वहीं 1998 से 2003 के बीच भी कई प्रयास हुए, लेकिन हंगामे और विरोध के कारण हर बार असफल रहे। यहां तक की संसद में बिल की कॉपी फाड़ने जैसी घटनाएं भी हुईं जो लोकतंत्र के लिए शर्मनाक हैं।

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