पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी: भारत के सर्वप्रिय ‘प्रणब दा’ की पुण्यतिथि पर विशेष श्रद्धांजलि

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी : 31 अगस्त 2020 को भारत ने अपना एक महान सपूत, कुशल राजनीतिज्ञ और दूरदर्शी राजनेता खो दिया था। भारत के 13वें राष्ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी की आज पुण्यतिथि है। राजनीति के पंडित और सर्वदलीय सहमति बनाने में माहिर ‘प्रणब दा’ का जीवन भारतीय लोकतंत्र, संसदीय गरिमा और देश सेवा की एक जीवंत मिसाल है।

शुरुआती जीवन और शिक्षा

प्रणब मुखर्जी का जन्म 11 दिसंबर 1935 को पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के मिराती गांव में हुआ था। उनके पिता कामदा किंकर मुखर्जी स्वतंत्रता सेनानी थे और पश्चिम बंगाल विधान परिषद के सदस्य भी रहे।

प्रणब दा ने सूरी विद्यासागर कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और बाद में कलकत्ता विश्वविद्यालय से इतिहास एवं राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर (M.A.) तथा कानून (LL.B.) की डिग्री हासिल की। राजनीति में कदम रखने से पहले उन्होंने एक कॉलेज प्राध्यापक और पत्रकार के रूप में भी कार्य किया।

राजनीतिक सफर और ‘संकटमोचक’ की भूमिका

1969 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पारखी नजरों ने प्रणब मुखर्जी की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें राज्यसभा के जरिए सक्रिय राजनीति में लाया गया। इसके बाद उनका राजनीतिक सफर अभूतपूर्व रहा:

  • मंत्रालयों का व्यापक अनुभव: डॉ. प्रणब मुखर्जी भारत के एकमात्र ऐसे नेता रहे जिन्होंने देश के चार प्रमुख मंत्रालयों—वित्त, रक्षा, विदेश और वाणिज्य—का नेतृत्व सफलता पूर्वक संभाला।

  • कांग्रेस और सरकार के ‘ट्रबलशूटर’: 2004 से 2012 के दौरान यूपीए (UPA) सरकार के कार्यकाल में प्रणब दा को सरकार का सबसे बड़ा संकटमोचक माना जाता था। चाहे गठबंधन के सहयोगियों को साधना हो, किसी जटिल कानून पर सहमति बनानी हो या विपक्षी दलों से संवाद स्थापित करना हो, प्रणब दा की मध्यस्थता अंतिम और सर्वमान्य होती थी।

  • संसदीय ज्ञान के भंडार: वे भारतीय संविधान, संसदीय नियमों और देश के इतिहास के प्रकांड विद्वान थे। संसद में उनके भाषण और आंकड़े पेश करने का तरीका हमेशा अध्ययन का विषय रहा।

भारत के 13वें राष्ट्रपति (2012 – 2017)

2012 में वे देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद यानी 13वें राष्ट्रपति के रूप में चुने गए। राष्ट्रपति भवन में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई ऐतिहासिक पहल कीं:

  • ‘महामहिम’ शब्द की समाप्ति: उन्होंने राष्ट्रपति के लिए इस्तेमाल होने वाले औपनिवेशिक शब्द ‘हिज एक्सीलेंसी’ (His Excellency) या ‘महामहिम’ के आधिकारिक इस्तेमाल को बंद करवाकर ‘माननीय राष्ट्रपति’ शब्द को बढ़ावा दिया।

  • जनता के लिए राष्ट्रपति भवन: उन्होंने राष्ट्रपति भवन के दरवाजे आम जनता, शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए खोले। राष्ट्रपति भवन के ऐतिहासिक पुस्तकालय और संग्रहालय को आधुनिक रूप दिया।

डॉ. प्रणब मुखर्जी : राष्ट्रीय सम्मान और आरएसएस कार्यक्रम में ऐतिहासिक भाषण

  • भारत रत्न (2019): देश के विकास, राजनीति और सार्वजनिक जीवन में उनके अतुलनीय योगदान के लिए 2019 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।

  • नागपुर भाषण: राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत्त होने के बाद 2018 में नागपुर में आरएसएस (RSS) के कार्यक्रम में उनका शामिल होना काफी चर्चित रहा। वहा डॉ. प्रणब मुखर्जी ने अपने भाषण में भारत की बहुलतावादी संस्कृति, सहिष्णुता और देशभक्ति के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डाला, जिसे व्यापक रूप से सराहा गया।

निधन

31 अगस्त 2020 को 84 वर्ष की आयु में नई दिल्ली में उनका निधन हो गया।

डॉ. प्रणब मुखर्जी एक ऐसे सर्वमान्य नेता थे जिनका सम्मान दलीय राजनीति से ऊपर उठकर हर दल और विचारधारा के लोग करते थे। देश के आर्थिक सुधारों से लेकर कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने तक में उनका योगदान भारतीय इतिहास में हमेशा स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज रहेगा।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

डॉ. प्रणब मुखर्जी भारत के कौन से नंबर के राष्ट्रपति थे?

डॉ. प्रणब मुखर्जी भारत के 13वें राष्ट्रपति थे, उनका कार्यकाल वर्ष 2012 से 2017 तक रहा।

प्रणब मुखर्जी को 'भारत रत्न' से कब सम्मानित किया गया था?

डॉ. प्रणब मुखर्जी को देश सेवा में उनके अतुलनीय योगदान के लिए वर्ष 2019 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से नवाजा गया था।

भारतीय राजनीति में प्रणब मुखर्जी को 'ट्रबलशूटर' क्यों कहा जाता था?

उनके पास अद्भुत संसदीय ज्ञान, सर्वदलीय स्वीकार्यता और जटिल राजनीतिक व आर्थिक मुद्दों पर सहमति बनाने की अद्वितीय क्षमता थी, जिसके कारण वे सरकार और पार्टी के संकटमोचक कहलाते थे।

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