बाढ़ में चार मजदूरों की संदिग्ध मौत से मचा हड़कंप; बिहार में शराबबंदी, प्रशासनिक विफलता और सामाजिक त्रासदी पर विशेष रिपोर्ट।

पटना का बाढ़ शराब कांड — शराबबंदी के नाम पर सामाजिक त्रासदी, प्रशासनिक विफलता और सियासी जवाबदेही

1. घटना की जमीनी सच्चाई और जांच की अद्यतन स्थिति

पटना जिले के बाढ़ अनुमंडल स्थित बेढ़ना गांव के सैदपुर टोले में शनिवार रात हुई घटना केवल चार मौतों का आंकड़ा भर नहीं है, बल्कि यह शराबबंदी वाले राज्य में जारी अवैध जहरीले रसायन के निर्बाध तंत्र की बानगी है।

  • घटनाक्रम: बेढ़ना गांव में निर्माण कार्य और पास के एनटीपीसी प्रोजेक्ट में दैनिक मजदूरी करने वाले चार दोस्त—शशी कुमार (32), विकास राम (40), पंकज सिंह (45) और निशू कुमार (30)—एक जगह एकत्र हुए। मछली-भात की पार्टी के दौरान संदिग्ध रसायन/अवैध शराब का सेवन करते ही चारों की तबीयत बिगड़ने लगी। मुंह से झाग निकलने और असहनीय पेट दर्द के बाद अस्पताल ले जाते समय चारों ने दम तोड़ दिया।

  • प्रशासनिक रुख: घटना के बाद गुस्साए ग्रामीणों ने पटना-मोकामा फोरलेन को जाम कर स्थानीय पुलिस की सांठगांठ का आरोप लगाया। अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी (SDPO-1) राम कृष्णा के नेतृत्व में पहुंची पुलिस टीम ने खाली बोतलें जब्त की हैं और विसरा को फोरेंसिक प्रयोगशाला (FSL) भेजा है। हर बार की तरह प्रशासन मौतों का प्राथमिक कारण “विषाक्त खाद्य पदार्थ या संदिग्ध बीमारी” बताकर आधिकारिक पुष्टि से बचता नजर आ रहा है।

2. सामाजिक अभिशाप का पहलू (The Social Evil Angle)

बिहार में अप्रैल 2016 में जब ‘बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम’ लागू किया गया था, तब इसका मूल उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा, घरेलू हिंसा पर रोक और गरीब परिवारों के आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देना था। हालांकि, कानून के लागू होने के एक दशक बाद सामाजिक स्थिति अधिक जटिल और घातक हो चुकी है:

  • गरीब और वंचित वर्ग ही शिकार: जहरीली शराब (मिथेनॉल/डिनेचर्ड स्पिरिट) के शिकार अमूमन समाज के सबसे निचले पायदान—दैनिक मजदूर, राजमिस्त्री और वंचित तबके के लोग—होते हैं। अमीरों के लिए महंगी विदेशी शराब की “होम डिलीवरी” का एक समानांतर बाजार तैयार हो चुका है, जबकि गरीब जहर पीने को मजबूर हैं।

  • कमाऊ सदस्यों की मौत और उजड़ते परिवार: बाढ़ की घटना में जान गंवाने वाले चारों युवक अपने परिवारों के एकमात्र संबल थे। जहरीली शराब केवल एक व्यक्ति की जान नहीं लेती, बल्कि पूरे परिवार को भुखमरी, कर्ज और स्थायी सामाजिक असुरक्षा में धकेल देती है।

  • अपराध का नया सामाजिक ताना-बाना: शराबबंदी ने ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं का एक ऐसा वर्ग तैयार कर दिया है जो पढ़ाई या पारंपारिक रोजगार छोड़कर शराब की तस्करी और डिलीवरी नेटवर्क में आसान पैसे के लिए शामिल हो रहा है।

3. प्रशासनिक विफलता और पुलिस-सिंडिकेट गठजोड़

बाढ़ कांड यह साबित करता है कि राज्य का मद्यनिषेध विभाग और स्थानीय पुलिस नेटवर्क इस अवैध कारोबार को रोकने में पूरी तरह विफल रहे हैं:

4. सियासी दांव-पेच और जवाबदेही से पल्ला झाड़ना

बिहार में हर होच त्रासदी (Hooch Tragedy) के बाद राजनीति का एक ही ढर्रा देखने को मिलता है:

  • ‘जो पियेगा, वो मरेगा’ का रुख: सरकार और सत्ताधारी दल अक्सर मौतों के बाद सहानुभूति व्यक्त करने के बजाय पीड़ितों को ही कानून तोड़ने का दोषी ठहराते हैं।

  • विपक्ष का हंगामा बनाम अतीत का रिकॉर्ड: विपक्ष घटना के बाद सरकार के इस्तीफे और मुआवजे की मांग को लेकर सड़कों पर उतरता है, लेकिन नीतिगत सुधार या ठोस क्रियान्वयन के रोडमैप पर सर्वसम्मति का अभाव दिखता है।

  • आंकड़ों की कारस्तानी: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और राज्य पुलिस के मौतों के आंकड़ों में हमेशा भारी अंतर रहता है। प्रशासन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में “अज्ञात बीमारी” दर्ज कराकर मौतों के वास्तविक आंकड़े छिपाने की कोशिश करता है।

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