Rupi Soren Untold Story, रांची: झारखंड आंदोलन की कहानी में दिशोम गुरु शिबू सोरेन का नाम प्रमुख नेताओं में लिया जाता है। महाजनी प्रथा के खिलाफ संघर्ष से लेकर अलग झारखंड राज्य के आंदोलन तक उनका लंबा राजनीतिक और सामाजिक सफर रहा। लेकिन इस संघर्ष की एक कहानी घर की चारदीवारी के भीतर भी लड़ी जा रही थी। यह कहानी उनकी पत्नी रूपी सोरेन की है। शिबू सोरेन जब जंगलों और पहाड़ी इलाकों में रहकर आंदोलन को आगे बढ़ा रहे थे, उस समय घर और परिवार की जिम्मेदारी रूपी सोरेन संभाल रही थीं। वर्ष 2023 में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने उस दौर से जुड़ी कई घटनाएं साझा की थीं।
जब पुलिस घर पहुंचती थी, रूपी सोरेन देती थीं जवाब
रूपी सोरेन ने बताया था कि करीब 1970 के आसपास पुलिस अक्सर उनके घर आती थी और शिबू सोरेन के बारे में पूछताछ करती थी। एक बार पुलिस के लगातार सवाल करने पर उन्होंने जवाब दिया था कि यह शिबू सोरेन का घर नहीं, बल्कि रूपी सोरेन का घर है। उनके मुताबिक, उन्होंने पुलिस से कहा था कि शिबू सोरेन जहां हैं, पुलिस वहीं जाकर उन्हें खोजे। यह प्रसंग उस समय के माहौल को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है, जब शिबू सोरेन महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे और उनके परिवार को भी पुलिस की पूछताछ का सामना करना पड़ता था।
जब शिबू सोरेन का पता नहीं चला, जंगल तक पहुंचीं रूपी
आंदोलन के दौर में शिबू सोरेन टुंडी और आसपास के जंगल-पहाड़ी इलाकों में रहते थे। कई बार परिवार को लंबे समय तक उनकी कोई खबर नहीं मिलती थी। रूपी सोरेन ने इंटरव्यू में बताया था कि एक समय उन्हें शिबू सोरेन की चिंता हुई तो उन्होंने अपनी सास और ननद के साथ जंगल जाकर उन्हें खोजने का फैसला किया। उस समय उनकी गोद में बेटा दुर्गा भी था। तीनों जंगल में शिबू सोरेन की तलाश में निकलीं और काफी दूर तक भटकना पड़ा। रूपी सोरेन ने इसे अपने परिवार के लिए बेहद कठिन दौर बताया था।
महाजनों के खिलाफ संघर्ष में भी सामने आईं रूपी सोरेन
शिबू सोरेन के शुरुआती आंदोलन का एक बड़ा हिस्सा महाजनी और सूदखोरी की व्यवस्था के खिलाफ था। उन्होंने आदिवासियों को संगठित कर जमीन और अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर संघर्ष किया। टुंडी और आसपास के इलाकों में यह आंदोलन धीरे-धीरे मजबूत हुआ। रूपी सोरेन ने अपने पुराने इंटरव्यू में खेत पर कब्जा करने पहुंचे महाजनों का विरोध करने की घटना भी साझा की थी। उन्होंने बताया था कि महाजनों को खेत से हटाया गया और शिबू सोरेन की रिहाई के लिए भी उन्होंने प्रयास किए थे।
मंच से दूर रहकर भी आंदोलन का हिस्सा बनी रहीं
रूपी सोरेन को झारखंड आंदोलन की औपचारिक राजनीतिक नेता के रूप में देखना सही नहीं होगा। आंदोलन का राजनीतिक और संगठनात्मक नेतृत्व शिबू सोरेन और उनके सहयोगियों के हाथ में था। लेकिन किसी भी लंबे आंदोलन की कहानी सिर्फ सभाओं, नारों और जंगलों तक सीमित नहीं होती। उसके पीछे परिवारों की भी अपनी मुश्किलें होती हैं। रूपी सोरेन की कहानी इसी घरेलू संघर्ष का एक उदाहरण है। जब शिबू सोरेन घर से दूर रहते थे, तब बच्चों और परिवार की जिम्मेदारी रूपी सोरेन पर थी। पुलिस घर पहुंचती थी तो उन्हें सवालों का सामना करना पड़ता था और जब पति की कोई खबर नहीं मिलती थी तो वह परिवार की अन्य महिलाओं के साथ जंगल तक उनकी तलाश में जाती थीं।
झारखंड आंदोलन के इतिहास का एक अनकहा अध्याय
झारखंड आंदोलन के इतिहास में आमतौर पर बड़े नेताओं, आंदोलनों और राजनीतिक घटनाओं की चर्चा ज्यादा होती है। लेकिन उन आंदोलनों के दौरान परिवारों ने किस तरह की परिस्थितियों का सामना किया, यह पक्ष अपेक्षाकृत कम सामने आता है। रूपी सोरेन की जिंदगी इसी अनकहे पक्ष की कहानी बताती है। उन्होंने आंदोलन के मंच पर नेतृत्व नहीं किया, लेकिन उस दौर में घर संभालना, बच्चों की जिम्मेदारी उठाना, पुलिस की पूछताछ का सामना करना और जरूरत पड़ने पर जंगलों तक जाना उनके जीवन का हिस्सा रहा। शिबू सोरेन के संघर्ष की कहानी के साथ रूपी सोरेन का यह पक्ष उस दौर के पारिवारिक संघर्ष को भी सामने लाता है।


















