Ranchi- झारखंड सरकार के द्वारा विश्व आदिवासी दिवस को झारखंड जनजातीय महोत्सव- 2022
के रूप में आयोजित करना सच्चाई को छुपाना है. यह संयुक्त राष्ट्र की भावना और आदिवासी चिंताओं
से हटकर एक अलग त्योहार मनाने की कोशिश है. जबकि संविधान, कानून के साथ खिलवाड़ कर
अबतक आदिवासी समुदाय के साथ अन्याय अत्याचार और शोषण का होता रहा है.
जनजातीय महोत्सव- 2022 के आयोजन में संयुक्त राष्ट्र की भावनाओं का सम्मान हो
यह कहना है पूर्व सांसद और आदिवासी सेंगेल अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष सलखन मुर्मू का.
सालखन मुर्मू ने कहा है कि पिछले दो दशकों में झारखंड का आदिवासी समुदाय और भी कमजोर हुआ है.
उसके अधिकार, जल जंगल और जमीन पर हमले तेज हुए हैं. आजीविका पर संकट और भी गहरा हुआ है.
रोजी-रोटी की खोज में विस्थापन उनकी नियती बन गयी है.
तमाम कोशिशों के बाद भी हम उनकी समस्यायों का निदान करने में असफल हुए है.
जीवन के हर क्षेत्र में उन्हे चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
इस परिस्थिति में जनजातीय महोत्सव- 2022 के आयोजकों से आग्रह है कि 9 अगस्त के कार्यक्रम को संयुक्त राष्ट्र की भावना,
चिंता और आशंकाओं को सहजते हुए आयोजित करें.
जनजातीय महोत्सव- 2022 का आयोजन आदिवासी समुदाय के जले पर नमक छिड़कने जैसा है.
यह आयोजन उनकी समस्याओं को सामने नहीं लाता. उनकी चिंताओं को प्रतिबिम्बित नहीं करता.

















