Bihar Gobardhan Yojana, पटना: बिहार के ग्रामीण इलाकों में गोबर अब गंदगी का कारण बनने के बजाय स्वच्छ ऊर्जा और कमाई का जरिया बन रहा है। ग्रामीण विकास विभाग की गोबरधन योजना के तहत बेगूसराय जिले के तेघड़ा प्रखंड की बरौनी-2 ग्राम पंचायत में स्थापित बायोगैस संयंत्र इसका उदाहरण बनकर सामने आया है। लगभग 50 लाख रुपये की लागत से बने इस संयंत्र से आसपास के 22 घरों और पांच दुकानों को पाइपलाइन के माध्यम से बायोगैस की आपूर्ति की जा रही है। खास बात यह है कि इस पूरे संयंत्र के संचालन और प्रबंधन की जिम्मेदारी जीविका दीदियां संभाल रही हैं। गोबर से बायोगैस तैयार करने के साथ-साथ इससे निकलने वाली स्लरी से जैविक खाद भी बनाई जा रही है। इससे ग्रामीण परिवारों को स्वच्छ ईंधन, किसानों को जैविक खाद और महिलाओं को रोजगार तथा आमदनी का अवसर मिल रहा है।
50 लाख की लागत से स्थापित हुआ बायोगैस संयंत्र
स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) और लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत बरौनी-2 पंचायत में लगभग 50 लाख रुपये की लागत से बायोगैस संयंत्र स्थापित किया गया है। इसकी क्षमता प्रतिदिन दो मीट्रिक टन गोबर के प्रसंस्करण की है। संयंत्र में आधुनिक डी-वाटरिंग प्लांट भी लगाया गया है, जिसकी मदद से बायोगैस उत्पादन के बाद स्लरी से पानी और ठोस पदार्थ अलग किए जाते हैं। इस प्रक्रिया से प्राप्त तरल स्लरी का उपयोग खेतों में उर्वरक के रूप में किया जाता है। वहीं, ठोस गोबर को सुखाकर जैविक खाद तैयार की जाती है। इससे जैविक खेती को प्रोत्साहन मिलने के साथ किसानों को रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
22 घरों और 5 दुकानों तक पहुंच रही बायोगैस
बरौनी-2 पंचायत में स्थापित इस संयंत्र से पाइपलाइन के जरिए आसपास के 22 घरों और पांच दुकानों को बायोगैस उपलब्ध कराई जा रही है। स्थानीय परिवार इस गैस का उपयोग रसोई में कर रहे हैं। इससे उन्हें किफायती और पर्यावरण के अनुकूल ईंधन का विकल्प मिल रहा है। एलएसबीए के जिला सलाहकार आफताब आलम के अनुसार, संयंत्र में तैयार होने वाली बायोगैस का उपयोग स्थानीय परिवार खाना बनाने के लिए कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र में इस तरह की व्यवस्था से पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी मदद मिल रही है।
जीविका दीदियों के हाथों में संयंत्र के संचालन की जिम्मेदारी
इस परियोजना की सबसे खास बात यह है कि संयंत्र का संचालन और प्रबंधन जीविका ग्राम संगठन की महिलाएं कर रही हैं। इसके लिए जीविका दीदियों को तकनीकी संचालन, रखरखाव और प्रबंधन का विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। महिलाएं अब संयंत्र के संचालन से लेकर उसके रखरखाव तक की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। इससे उन्हें अपने ही क्षेत्र में रोजगार और नियमित आमदनी का अवसर मिल रहा है। यह पहल ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के साथ उनके भीतर उद्यमिता की भावना को भी बढ़ावा दे रही है।
बायोगैस और जैविक खाद की बिक्री से हो रही कमाई
जिला समन्वयक विश्वजीत कुमार के अनुसार, इस संयंत्र से बायोगैस की बिक्री के जरिए हर महीने लगभग 10 हजार से 12 हजार रुपये की आय हो रही है। वहीं, जैविक उर्वरक की बिक्री से प्रतिमाह करीब 2 हजार से 2,500 रुपये तक प्राप्त हो रहे हैं। गोबर की आपूर्ति, बिजली और संचालन से जुड़े खर्चों को निकालने के बाद बची राशि से जीविका दीदियों को आर्थिक लाभ मिल रहा है। इस तरह गोबर का उपयोग केवल बायोगैस बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जैविक खाद तैयार कर अतिरिक्त आय का रास्ता भी खुल रहा है।
बिहार में स्थापित हो चुकी हैं 38 गोबरधन इकाइयां
बरौनी-2 पंचायत की यह परियोजना स्वच्छता, अपशिष्ट प्रबंधन, वैकल्पिक ऊर्जा और महिला सशक्तीकरण को एक साथ जोड़ने का प्रयास है। इससे सार्वजनिक स्थानों और गौशालाओं में गोबर के अनियंत्रित जमाव से होने वाली गंदगी और दुर्गंध की समस्या में भी कमी आई है। ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि गोबरधन योजना के तहत बायोगैस संयंत्रों की स्थापना पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और सम्राट सरकार की दूरदर्शी सोच का परिणाम है। सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता, हरित ऊर्जा और महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बरौनी-2 पंचायत में जीविका दीदियों की ओर से संयंत्र के सफल संचालन को महिला आत्मनिर्भरता का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। मंत्री के अनुसार, स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) और लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत राज्य के विभिन्न जिलों में अब तक 38 गोबरधन इकाइयां स्थापित की जा चुकी हैं। इन इकाइयों के माध्यम से जैविक कचरे का बेहतर प्रबंधन, स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।
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