Bihar Juvenile Justice System: बच्चे का अतीत नहीं तय करेगा भविष्य, पटना में किशोर न्याय व्यवस्था को लेकर बड़ा मंथन

Bihar Juvenile Justice System: किशोर न्याय व्यवस्था को अधिक बाल-अनुकूल, संवेदनशील और पुनर्वास केंद्रित बनाने के लिए कानून के साथ उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली ने शनिवार को पटना के ज्ञान भवन में आयोजित राज्यस्तरीय परामर्श कार्यक्रम में यह बात कही। यह कार्यक्रम किशोर न्याय (बालकों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 के दस वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित किया गया था। पटना उच्च न्यायालय, समाज कल्याण विभाग और यूनिसेफ के संयुक्त तत्वावधान में हुए कार्यक्रम में किशोर न्याय व्यवस्था से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई।

कानून के साथ प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर

न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली ने कहा कि केवल कानून का होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका प्रभावी क्रियान्वयन भी जरूरी है। उन्होंने परिवार और समुदाय आधारित देखभाल, विशेषज्ञों के मूल्यांकन, गैर-हिरासत आधारित उपायों और अपराध की रोकथाम को मजबूत करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संस्थागत देखभाल अपने आप में पुनर्वास नहीं है। बच्चे की जरूरत के अनुसार शिक्षा, चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक सहायता, परिवार में पुनर्स्थापना और कौशल प्रशिक्षण जैसी व्यवस्थाएं सुनिश्चित करना जरूरी है। दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष शिक्षक, सांकेतिक भाषा के दुभाषिए और मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की जरूरत भी उन्होंने बताई। साथ ही किशोर न्याय अधिनियम की धारा 15 के तहत बहु-विषयक प्रारंभिक मूल्यांकन को प्रभावी बनाने पर जोर दिया।

बच्चे के अतीत से तय नहीं होना चाहिए भविष्य

पटना उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधीर सिंह ने कहा कि किशोर न्याय व्यवस्था में आने वाला प्रत्येक बच्चा अपने साथ एक भविष्य लेकर आता है। इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बच्चे का अतीत उसके भविष्य का निर्धारण न करे। उन्होंने किशोर न्याय व्यवस्था को बच्चों के हित और उनके भविष्य को ध्यान में रखकर संचालित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

किशोर न्याय निगरानी समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रभात कुमार सिंह ने बिहार में उपलब्ध व्यवस्थाओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि राज्य में 23 प्रेक्षण गृह और पांच सुरक्षित स्थान कार्यरत हैं। किशोर न्याय बोर्डों के प्रधान दंडाधिकारियों के लिए तीन वर्ष का निश्चित कार्यकाल और आठ दिवसीय अनिवार्य प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई है। उन्होंने यह भी बताया कि अप्रैल 2015 से जुलाई 2024 के बीच राज्य में 1,403 बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया पूरी हुई है।

Bihar Juvenile Justice System

लापता और अपहृत बच्चों की बरामदगी बड़ी चुनौती

डीजीपी विनय कुमार ने लापता, अपहृत और मानव तस्करी के शिकार बच्चों की बरामदगी को बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि एनसीआरबी के अनुसार वर्ष 2025 में बिहार में 14,699 बच्चों के लापता या अपहृत होने के मामले दर्ज हुए, जिनमें 52 प्रतिशत की बरामदगी हो सकी। उन्होंने बच्चों की बरामदगी के लिए शुरुआती 3 से 24 घंटे के दौरान कार्रवाई को महत्वपूर्ण बताया। इसके साथ ही पुलिस, परिवार और स्कूल के बीच बेहतर समन्वय तथा वात्सल्य पोर्टल पर बच्चों से संबंधित जानकारी समय पर अपलोड करने पर जोर दिया।

संस्थागत देखभाल को अंतिम विकल्प बनाने पर जोर

यूनिसेफ चीफ मोनिका एन. नीलसन ने कहा कि किशोर न्याय व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों को दंडित करना नहीं, बल्कि उन्हें संरक्षण, पुनर्वास और बेहतर भविष्य का अवसर देना है। उन्होंने परिवार आधारित देखभाल, स्पॉन्सरशिप और फॉस्टर केयर को बढ़ावा देने की जरूरत बताई। साथ ही संस्थागत देखभाल को अंतिम विकल्प के रूप में रखने पर जोर दिया। कार्यक्रम में आयोजित तकनीकी सत्र में बाल संरक्षण, पुनर्वास, सामाजिक पुनर्समावेशन, परिवार आधारित देखभाल, लापता बच्चों की बरामदगी, गैर-हिरासत आधारित उपाय, संस्थागत देखभाल, केस मैनेजमेंट और बच्चों के सर्वोत्तम हित जैसे विषयों पर चर्चा हुई।

विशेषज्ञों और संबंधित पदाधिकारियों ने किशोर न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी, संवेदनशील और बाल-अनुकूल बनाने के उपायों पर विचार साझा किए। कार्यक्रम में न्यायिक पदाधिकारी, समाज कल्याण विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न जिलों के पदाधिकारी, बाल संरक्षण विशेषज्ञ, यूनिसेफ प्रतिनिधि और किशोर न्याय व्यवस्था से जुड़े अन्य हितधारक मौजूद रहे।

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