Controversy : तिरुपति मंदिर प्रशासन ने कहा – ‘लड्डू प्रसादम की पवित्रता हुई बहाल’, अमूल का दावा – ‘तिरुपति को हमने नहीं की घी की आपूर्ति’

डिजीटल डेस्क : Controversy तिरुपति मंदिर प्रशासन ने कहा – ‘लड्डू प्रसादम की पवित्रता हुई बहाल’, अमूल का दावा – ‘तिरुपति को हमने नहीं की घी की आपूर्ति’।

तिरुपति के प्रसिद्ध लड्डू प्रसादम में जानवरों की चर्बी के इस्तेमाल पर हुए विवाद के बाद अब मंदिर प्रशासन यानी तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) ने कहा है कि प्रसाद की पवित्रता बहाल कर ली गई है। टीटीडी ने कहा है कि अब प्रसाद पूरी तरह से पवित्र और बेदाग है।

सोशल मीडिया पर साझा किए पोस्ट में टीटीडी ने लिखा कि ‘श्रीवारी लड्डू की दिव्यता और पवित्रता अब बेदाग है। टीटीडी सभी श्रद्धालुओं की संतुष्टि के लिए लड्डू प्रसादम की पवित्रता की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है।’

आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू ने किया था खुलासा

बता दें कि तिरुमाला की पहाड़ियों पर स्थित श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर का प्रबंधन तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम बोर्ड (टीटीडी) करता है।

अब मंदिर प्रबंधन संस्था ने खुलासा किया है कि गुणवत्ता के लिए जांचे गए नमूनों से पता चला कि प्रसाद के लड्डू बनाने के लिए घटिया घी का इस्तेमाल हो रहा था, जिसमें जानवरों की चर्बी की मौजूदगी का पता चला है।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने भी यही दावा किया था। इसे लेकर पूरे देश में नाराजगी देखी गई। दूसरी ओर, आरोपों के बाद बैकफुट पर दिख रही वाईएसआरसीपी पार्टी ने टीडीपी की मौजूदा सरकार पर ही आरोप लगाए हैं और इसे टीडीपी की भटकाने वाली राजनीति करार दिया।

वाईएसआरसीपी ने सीएम के आरोपों को मनगढ़ंत करार दिया। बता दें कि केंद्र सरकार ने भी आंध्र प्रदेश सरकार से तिरुपति मंदिर के प्रसाद को लेकर हुए विवाद पर रिपोर्ट मांगी है और जांच के बाद उचित कार्रवाई का वादा किया है।

इस बीच टीटीडी के कार्यकारी अधिकारी जे श्यामला राव ने कहा कि प्रयोगशाला जांच में चयनित नमूनों में पशु चर्बी की मौजूदगी का पता चला है और बोर्ड ‘मिलावटी’ घी की आपूर्ति करने वाले ठेकेदार को काली सूची में डालने की प्रक्रिया में है।

अमूल का बयान – ‘हमने तिरुपति को घी की आपूर्ति नहीं की’

तिरुपति बालाजी मंदिर विवाद में फेमस डेयरी ब्रांड अमूल का नाम भी सामने आया है। सोशल मीडिया पर ऐसी कई पोस्ट हैं जिनमें कहा जा रहा है कि अमूल ने तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) को घी उपलब्ध कराया है।

अमूल ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है। अमूल ने एक बयान में कहा, ‘हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि अमूल ने कभी भी टीटीडी को घी उपलब्ध नहीं कराया है।’ अमूल ने अपने बयान में कहा कि उनका घी आईएसओ प्रमाणित सुविधाओं में उच्च गुणवत्ता वाले दूध से बनाया जाता है।

तिरुपति मंदिर में भक्तों को मिलने वाले लड्डुओं में जानवरों की चर्बी और मछली का तेल मिलाने का मामला सामने आया है। इसके बाद यह मामला काफी गरमा गया है। अमूल से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए आरोपों की सफाई दी है।

इसमें कंपनी ने कहा उन अफवाहों को खारिज किया है जिनमें आरोप लगाया गया है कि उसने तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम को घी उपलब्ध कराया है। अमूल ने अपने बयान में कहा है कि उनका घी हाई क्वालिटी के शुद्ध दूध के फैट से बनता है।

इस घी को कई क्वालिटी जांच से गुजारा जाता है। ऋररअव मानकों के अनुरूप इस चीज के भी टेस्ट किए जाते हैं कि इसमें कोई मिलावट न हो। कंपनी ने कहा कि इस पोस्ट का उद्देश्य अमूल के खिलाफ गलत सूचना अभियान को समाप्त करना है।

प्रसादम में इस्तेमाल घी में चर्बी और मछली के तेल की लैब जांच में हुई थी पुष्टि

बता दें कि हाल ही में ये अफवाहें तब सामने आईं जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने वाईएस जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली पिछली सरकार पर तिरुपति लड्डू बनाने में एनिमल फैट सहित घटिया सामग्री का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।

नायडू ने दावा किया कि तिरुपति में प्रतिष्ठित श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर भी इन प्रथाओं से अछूता नहीं है।टीडीपी प्रवक्ता अनम वेंकट रमण रेड्डी ने गुजरात स्थित एक लैब की रिपोर्ट पेश करके इन आरोपों का समर्थन किया।

रिपोर्ट में कथित तौर पर टीटीडी द्वारा इस्तेमाल किए गए घी के नमूनों में जानवरों की चर्बी और मछली के तेल की मौजूदगी की पुष्टि की गई। इस मामले में अब वाईएसआरसीपी के वरिष्ठ नेता वाई वी सुब्बा रेड्डी ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में याचिका दायर की है।

वहीं सुप्रीम कोर्ट में भी एक और याचिका दायर की गई है। बता दें कि तिरुमाला में रोजाना लगभग 3 लाख लड्डू बनाए और बांटे जाते हैं। इन लड्डुओं की बिक्री से लगभग 500 करोड़ रुपये की सालाना कमाई होती है। प्रत्येक लड्डू का वजन 175 ग्राम होता है

। तिरुपति लड्डुओं का इतिहास 300 वर्षों से ज्यादा पुराना है। इनकी शुरुआत साल 1715 से हुई थी। साल 2014 में तिरुपति लड्डू को भौगोलिक संकेत का दर्जा दिया गया।

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