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आदिवासियों के सामने विस्थापन, कुपोषण, अशिक्षा एक गंभीर चुनौती

रांचीः आदिवासी शब्द दो शब्दों ‘आदि’ और ‘वासी’ से बना है, इसका अर्थ ‘मूल निवासी’ होता है। भारत में लगभग 700 आदिवासी समूह उसके उप-समूह हैं। इनमें लगभग 80 प्राचीन आदिवासी जातियां हैं। हमारी जनसंख्या का 8.6% (10 करोड़) हिस्सा आदिवासी और कूल भू भाग का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा आदिवासी बहुल है। जबकि राष्ट्रीय संसाधन का करीबन 70 प्रतिशत खनिज, वन, वन्य प्राणी, जल संसाधन और मानव संसाधन इसी आदिवासी बहुल क्षेत्रों में है।

विडम्बना यह है कि फिर भी आदिवासियों के सामने विस्थापन, कुपोषण, अशिक्षा एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। आज वे अपने मूल एवं समृद्ध देशज ज्ञान से दूर होते जा रहे हैं। इसका एक जीवंत उदाहरण अंडमान निकोबार द्विप समूह का जरवा आदिवासी हैं। जरवा आदिवासियों के पास सुनामी जैसी भयानक प्राकृतिक आपदा में भी खुद को बचा लेने और प्राकृतिक आपदा का अंदेशा लगा लेने की अद्भुत क्षमता है। इसी क्षमता के बुते इन्होने अपने को सुनामी जैसी लहर से बचाया।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने विभिन्न देशों में रह रहे जनजातीय, आदिवासी समाज की उपेक्षा, गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी एवं बंधुआ मजदूरी जैसी समस्याओं से निराकरण के लिए वर्ष 1994 में प्रतिवर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाने का फैसला किया है।

आज झारखंड में विश्व आदिवासी दिवस पर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों और संगठनों के द्वारा जगह –जगह कार्यकर्मों का आयोजन किया जा रहा है। परन्तु मूल सवाल तो उनके जीवन में बदलाव और उनके परंपरागत अधिकारों की रखवाली का है। आज भी वे भुखमरी, बदहाली और विस्थापन का दंश झेल रहे है।

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