Gaya Kala Namak Rice Farming: सामान्य चावल से कम उत्पादन, फिर भी इतनी कीमत! जानिए गया के काला नमक राइस की पूरी कहानी

Gaya Kala Namak Rice Farming: हिमालय की तराई वाले क्षेत्रों में प्रसिद्ध दुर्लभ काला नमक राइस अब बिहार के गया जिले की धरती पर भी उगाया जा रहा है। गया के मटिहानी क्षेत्र के किसान बृजेंद्र चौबे ने करीब 18 से 20 बीघा भूमि में इस विशेष किस्म के चावल की खेती शुरू की है। खास बात यह है कि खेती पूरी तरह गौ आधारित जैविक पद्धति से की जा रही है।

काला नमक राइस को कई जगहों पर बुद्धा राइस के नाम से भी जाना जाता है। इसकी खास सुगंध और विशेषताओं के कारण इसकी अलग पहचान है। किसान बृजेंद्र चौबे पिछले दो वर्षों से इस धान की खेती का परीक्षण कर रहे थे। परीक्षण के अनुभव के बाद अब उन्होंने बड़े स्तर पर इसकी खेती शुरू की है।

दो वर्षों के ट्रायल के बाद बड़े पैमाने पर खेती

किसान बृजेंद्र चौबे के अनुसार, काला नमक राइस की खेती शुरू करने से पहले उन्होंने लगातार दो वर्षों तक इसका ट्रायल किया। खेती के परिणाम और फसल की संभावनाओं को देखने के बाद इस वर्ष करीब 18 से 20 बीघा जमीन में इसकी खेती की गई है।

काला नमक चावल सामान्य धान की किस्मों से अलग माना जाता है। इसका उत्पादन सामान्य चावल की तुलना में कम हो सकता है, लेकिन इसकी बाजार में अलग मांग बताई जाती है। इसकी कीमत भी सामान्य चावल की तुलना में अधिक होती है और बाजार में इसकी कीमत करीब 200 रुपये प्रति किलो तक बताई जाती है।

क्या है काला नमक राइस की खासियत?

काला नमक राइस अपनी विशेष सुगंध और स्वाद के लिए जाना जाता है। इसे बुद्धा राइस के नाम से भी पहचान मिली है। इस किस्म के चावल को जीआई टैग भी प्राप्त है, जिससे इसकी विशिष्ट पहचान और महत्व बढ़ जाता है।

इसकी मांग देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा विदेशों में भी बताई जाती है। हालांकि, गया में इसकी खेती किसानों के लिए एक नया प्रयोग माना जा रहा है। सफल उत्पादन होने पर यह क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी एक वैकल्पिक फसल के रूप में संभावनाएं पैदा कर सकता है।

बिना रासायनिक खाद के हो रही जैविक खेती

इस खेती की सबसे बड़ी विशेषता इसका जैविक तरीका है। किसान बृजेंद्र चौबे फसल में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग नहीं कर रहे हैं।

खेती के लिए गोबर, गोमूत्र, छाछ, सहजन और नीम जैसी प्राकृतिक सामग्री से तैयार जैविक घोल का इस्तेमाल किया जा रहा है। गौ आधारित जैविक पद्धति के माध्यम से फसल को तैयार करने की कोशिश की जा रही है।

जैविक खेती के इस प्रयोग से मिट्टी की प्राकृतिक गुणवत्ता बनाए रखने और रासायनिक पदार्थों के उपयोग को कम करने पर भी जोर दिया जा रहा है।

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पोषक तत्वों को लेकर भी चर्चा में है यह चावल

विशेषज्ञों के अनुसार, काला नमक चावल में प्रोटीन, आयरन और जिंक जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसकी पोषण संबंधी विशेषताओं के कारण भी यह लोगों के बीच चर्चा का विषय रहा है।

मगध विश्वविद्यालय के बॉटनी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर अमित कुमार सिंह ने इस चावल की विशेषताओं पर जानकारी दी। हालांकि, किसी भी खाद्य पदार्थ को बीमारी के उपचार के रूप में देखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है। विशेष रूप से डायबिटीज या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को अपने डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही खान-पान से जुड़े निर्णय लेने चाहिए।

गया के किसानों के लिए नई संभावना

गया में काला नमक राइस की खेती को प्राचीन और विशेष धान की किस्मों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही यह जैविक खेती के क्षेत्र में भी एक नया प्रयोग है।

यदि इस खेती के अच्छे परिणाम सामने आते हैं, तो आने वाले समय में गया और आसपास के क्षेत्रों के किसान भी इस विशेष किस्म की खेती की संभावनाओं को तलाश सकते हैं। फिलहाल मटिहानी के खेतों में लहलहा रहा काला नमक राइस किसानों और कृषि से जुड़े लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

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