रांची: “राजा जी, आपके राज में बड़ा खेल हो रहा है। देखिए न, होटवार जेल अब डकैतों का नहीं, नेतावन और आईएएस अफसरों का नया ‘गेस्ट हाउस’ बन गया है। कभी जो जेल खूनी नक्सलियों के लिए जाना जाता था, आजकल वहां सूट-बूट वाले वीआईपी नजर आ रहे हैं। और हां, राजा जी, इनमें कुछ तो आपके ही दरबार के हैं!”
झारखंड, जो एक समय अपने कोयला, लोहा और अभ्रक की खदानों से देश को रौशन करता था, अब होटवार जेल की खिड़कियों से चमक रहा है। फर्क इतना है कि वहां अब खनन माफिया नहीं, खनन घोटाले के मास्टरमाइंड बंद हैं। और ये मास्टरमाइंड कोई मामूली नहीं—कभी मंत्री थे, कभी सचिव। अब वही होटवार की बैरक नंबर 105 और 115 में नया पत्ता खेल रहे हैं।
होटवार: नया ‘विधानसभा विश्रामगृह’?
पता चला है कि होटवार जेल में इन दिनों इतनी चहल-पहल है कि वहां की दीवारें भी सियासी बहस में भाग लेने लगी हैं। कोई अपने वकील से रिव्यू पिटीशन पर चर्चा कर रहा है, कोई बैरक में प्रेस कॉन्फ्रेंस की योजना बना रहा है। कौन कहता है कि जेल में लोकतंत्र का गला घोंटा जाता है? झारखंड की जेलों में तो लोकतंत्र का रिहर्सल हो रहा है!
‘VIP जेल’ में व्यवस्था भी VIP
हैरत की बात है कि जो जेल एक समय खूंखार अपराधियों के लिए दहशत का नाम हुआ करता था, वो अब ‘स्वागत केंद्र’ जैसा महसूस होने लगा है। सुनने में आया है कि यहां बैरक के बाहर चाय भी स्पेशल कट में मिलती है। और अगर आप बहुत बड़े नेता हों, तो जेल के अंदर भी ‘संबोधन सभा’ का आयोजन संभव है — बशर्ते CBI और ED थोड़ी मोहलत दे दें।
राजा जी, कुछ कीजिए!
ऐसे में जनता सवाल पूछ रही है: “राजा जी, आपके राजपाट में यह सब कैसा खेल चल रहा है?”
कभी लोहा बेचने वाले नेता अब न्याय की हथकड़ी में हैं, और कानून का कोट पहनने वाले अफसर अब कटघरे में।
अगर यही हाल रहा, तो झारखंड का भविष्य कहीं होटवार की बैरकों में फाइल बनकर न रह जाए।
राजा जी, वक्त है कि आप दरबार से निकलें और जमीनी हकीकत देखें। वरना होटवार की बैरकें जल्द ही झारखंड के ‘विकास मॉडल’ का नया प्रतीक बन जाएंगी—जहाँ हर अपराधी सोचता है:
“पकड़े गए तो क्या हुआ? चलो होटवार, वहां सब अपने ही हैं!”
नोट: यह लेख एक व्यंग्य है और इसका उद्देश्य वर्तमान हालातों पर सवाल खड़ा करना है, न कि किसी व्यक्ति विशेष को आहत करना।


















