Sirmatoli flyover विवाद पर रामेश्वर उरांव का बड़ा बयान-मैं बाबूलाल की भाषा नहीं बोलूंगा, पर आदिवासी समाज की भावना आहत हुई है…

Sirmatoli flyover 

Ranchi : सिरमटोली फ्लाईओवर को लेकर चल रहे विवाद के बीच झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री और वर्तमान कांग्रेस विधायक रामेश्वर उरांव ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। हालांकि उन्होंने साफ किया कि वे इस मुद्दे पर भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी जैसी आक्रामक भाषा का प्रयोग नहीं करेंगे, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि आदिवासी समाज की भावनाएं इस परियोजना से आहत हुई हैं और इस दर्द को नकारा नहीं जा सकता।

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मैं कोर आदिवासी हूं

उरांव ने कहा, “मैं कोर आदिवासी हूं। जल, जंगल और जमीन केवल नारा नहीं, यह मेरे अंदर की आत्मा से जुड़ा हुआ भाव है। हमारी संस्कृति, सभ्यता, त्योहार-ये सब हमारी पहचान हैं। चाहे सरहुल हो, कर्मा हो, बाहा पर्व हो या संथाली समाज के उत्सव-हम इन सबका हिस्सा हैं और हमेशा रहेंगे।”

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Sirmatoli flyover : यह सच है कि आदिवासी समाज की भावना आहत हुई है-रामेश्वर उरांव

उन्होंने गर्व से कहा कि कुछ लोग हमें ‘जंगली’ कहकर अपमानित करने की कोशिश करते हैं, लेकिन उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं है। हम जंगलों में पले-बढ़े हैं, नदियों-नालों से खेले हैं और आज भी हमारा प्रेम इन्हीं से है।

उरांव ने यह भी जोड़ा कि फ्लाईओवर के निर्माण से पास स्थित सरना स्थल को लेकर उठ रही चिंता को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। उन्होंने कहा, “यह सच है कि आदिवासी समाज की भावना आहत हुई है और यह चोट धीरे-धीरे लोगों के हृदय और मानस में घर कर जाएगी।”

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हमारी एकता हमारी सबसे बड़ी ताकत है

उन्होंने कहा कि यह सवाल केवल किसी एक सरकार का नहीं है, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता से जुड़ा मामला है। “झारखंड में आज भी आदिवासी समाज की संख्या कम नहीं है। हम उरांव हो या संथाल, हम जातियों में नहीं बंटते-हम एक हैं। हमारी एकता हमारी सबसे बड़ी ताकत है।

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रामेश्वर उरांव ने भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना की कि भविष्य में भी आदिवासी समाज एकजुट रहे और अपनी परंपरा, संस्कृति व सभ्यता को बचाकर रखे।

विकास के साथ-साथ परंपराओं का भी सम्मान करे सरकार

उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में चाहे जिसकी भी सरकार हो, जनता की भावना का आदर होना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह संवेदनशीलता के साथ निर्णय ले और विकास के साथ-साथ परंपराओं का भी सम्मान करे।

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पूर्व मंत्री ने कहा कि “विकास जरूरी है, लेकिन अगर वह किसी समुदाय की आस्था को कुचल कर हो, तो वह टिकाऊ नहीं हो सकता। हमें समावेशी सोच रखनी होगी।

मदन सिंह की रिपोर्ट–

Saffrn

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