रांची: कानून व्यवस्था और मानवाधिकारों के क्षेत्र में झारखंड की स्थिति चिंता का विषय बनती जा रही है। इंडिया जस्टिस रिपोर्ट-2025 के अनुसार झारखंड राज्य देश के 18 बड़े और मध्यम श्रेणी के राज्यों में जेल व्यवस्था के मामले में 17वें स्थान पर है। रिपोर्ट में जेलों की स्थिति, सुविधाएं, कर्मचारियों की उपलब्धता और सुरक्षा के आधार पर यह रैंकिंग जारी की गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, झारखंड की जेलों की हालत पड़ोसी राज्यों की तुलना में बेहद खराब है। जहां ओड़िशा को 6वां, पश्चिम बंगाल को 11वां, बिहार को 12वां और उत्तर प्रदेश को 16वां स्थान मिला है, वहीं झारखंड 17वें पायदान पर सिमट गया है। यह स्थिति जेलों में बंदियों की अधिक भीड़, स्टाफ की भारी कमी, और मूलभूत सुविधाओं के अभाव की ओर संकेत करती है।
सिर्फ जेल व्यवस्था ही नहीं, बल्कि राज्य मानवाधिकार आयोग की स्थिति भी झारखंड में अत्यंत दयनीय है। रिपोर्ट के अनुसार झारखंड को 21वां स्थान मिला है, जो इस बात का संकेत है कि यहां मानवाधिकार संरक्षण का तंत्र बेहद कमजोर है। उल्लेखनीय है कि झारखंड में आयोग का अध्यक्ष पद लंबे समय से खाली है, जबकि इस पद पर रिटायर्ड चीफ जस्टिस को नियुक्त किया जाना होता है।
इंडिया जस्टिस रिपोर्ट-2025:
झारखंड को पुलिस विभाग की रैंकिंग में 12वां स्थान मिला है, जो इसे थोड़ा बेहतर स्थिति में रखता है, लेकिन अभी भी सुधार की आवश्यकता को इंगित करता है। वहीं न्यायिक व्यवस्था यानी ज्यूडिशियरी रैंकिंग में झारखंड को 13वां स्थान मिला है। यह स्थिति ओड़िशा (12वां) से थोड़ी पीछे, लेकिन बिहार (15वां), यूपी (17वां) और बंगाल (18वां) से बेहतर है।
लीगल एड यानी मुफ्त कानूनी सहायता के क्षेत्र में झारखंड की स्थिति थोड़ी संतोषजनक है। यहां इसे 11वां स्थान मिला है। हालांकि ओड़िशा इस मामले में 7वें स्थान पर है, जबकि बाकी पड़ोसी राज्यों बिहार, बंगाल और यूपी झारखंड से पीछे हैं।
इंडिया जस्टिस रिपोर्ट-2025 में झारखंड की स्थिति साफ बताती है कि राज्य को न्याय और मानवाधिकार के मोर्चे पर काफी कुछ सुधार करने की आवश्यकता है। जेलों की बदहाली, मानवाधिकार आयोग की निष्क्रियता और लीगल इंफ्रास्ट्रक्चर की कमजोरी शासन की प्राथमिकता में बदलाव की मांग कर रही है।


















