पलामू: नक्सलियों के सेफ जोन के रूप में झारखंड के कई जिलों के सुदूरवर्ती गांवों नजर आते हैं. जहां आजादी के 70 के साल बाद भी बदहाली साफ नजर आती है. लेकिन JSLPS के निर्माण के बाद सरकार के प्रयास से बदलाव शुरू हो चुका है. हम बात कर रहे हैं झारखंड की राजधानी रांची से 250 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पलामू के मनातू प्रखंड की. जंगलों से घिरे इस प्रखंड में कई गांव ऐसे हैं, जहां के लोग अंधेरे में रहने को मजबूर हैं. यह अंधेरा दीए-बाती की कमी से नहीं, बल्कि शिक्षा की कमी से आयी है. जिसने ग्रामीणों के भविष्य को अंधकार से ढक रखा था.
आदिम जनजातियों के करीब 370 परिवार वाला मनातू प्रखंड के कई गांवों में JSLPS ने उड़ान कार्यक्रम शुरू किया है. जिसके माध्यम से इन परिवार के बच्चों को सुष्मंती और रिंकी देवी प्राथमिकी शिक्षा दे रही हैं. पहले इन गांवों में सिर्फ स्थानीय भाषाओं की गूंज सुनायी पड़ती थी. लेकिन अब क,ख,ग,घ, A,B,C,D और 1,2,3,4 की अनुगूंज सुनायी देती है.
सूदूरवर्ती गांव के घरों से नंगे पांव हांथों में किताब-कांपिया लिए बच्चे खुशी-खुशी पाठशाला की ओर आते दिखायी देते हैं. पाठशाला में उन्हें JSLPS की दोनों दीदीयों का सानिध्य मिलता है. जहां वे मनोरंजक कहानियां, कविताएं और स्वच्छता का संदेश प्राप्त कर रहे हैं.
आदिम जनजातीय सदस्यों को राज्य और केन्द्र सरकार ने संरक्षित की श्रेणी में रखा है. JSLPS के उड़ान प्रोजेक्ट के तहत इन गांवों में पाठशालाएं खोली गयी हैं. इस परियोजना के तहत आदिम जनजाति के नई पीढ़ी को साक्षर करने की कोशिश की जा रही है. इसके अलावा इन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है.
पाठशाला की संचालिकाओं ने बताया कि ग्रामीण बच्चों को पाठशाला से जोड़ने में शुरूआती दौर में काफी मुश्किल हुआ. लेकिन बच्चे अब खुद स्कूल आते हैं. सरकार के प्रयास से JSLPS उड़ान कार्यक्रम चालाया जा रहा है. जिसके तहत पलामू के मनातू के इलाके में चिड़ी खुर्द, रंगेया, दलदलीया, कोहबरिया, धूमखाड़, उरुर, गौरवा टोला में पाठशाला शुरू की है. जो वर्तमान में संचालित है. ये बच्चे साक्षर होने के बाद अन्य लोगों द्वारा छले नहीं जाएंगे और सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकेंगे.
रिपोर्ट- पलामू


















