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Khatiya Ambulance: खटिया एंबुलेंस साहेब… रिम्स-2 में तो अरबों लगा रहे हैं, साहेब! थोड़ा तो खटिया एंबुलेंस में भी खर्च करिए…

झारखंड में RIMS-2 पर अरबों के निवेश के बीच ग्रामीण इलाकों में गर्भवती महिलाओं को खटिया पर अस्पताल ले जाने की मजबूरी पर स्वास्थ्य व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य।


Khatiya Ambulance गिरिडीह: झारखंड में स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे भरोसेमंद एंबुलेंस कौन सी है? अगर आपका जवाब 108, एडवांस लाइफ सपोर्ट या बेसिक लाइफ सपोर्ट है, तो माफ कीजिए… आप सरकारी विज्ञापन ज्यादा देख रहे हैं।

जमीन पर सबसे भरोसेमंद एंबुलेंस आज भी वही पुरानी चारपाई है, जिसे चार लोग कंधे पर उठाकर चलते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब इसे लोग प्यार से “खटिया एंबुलेंस” कहने लगे हैं। मानो यह भी स्वास्थ्य विभाग की कोई नई योजना हो।

साहेब, सुना है रिम्स-2 पर अरबों रुपये खर्च हो रहे हैं। आधुनिक भवन बनेंगे, अत्याधुनिक मशीनें आएंगी, सुपर स्पेशियलिटी सेवाएं मिलेंगी। यह सब बहुत अच्छी बात है। लेकिन एक छोटा-सा सवाल है…

जो मरीज अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाएगा, वह उस सुपर स्पेशियलिटी का लाभ कैसे लेगा?

गिरिडीह के पारसनाथ की गर्भवती महिला को शायद यह नहीं पता था कि राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी आधुनिक हो चुकी है। उसे तो बस इतना पता था कि सड़क नहीं है, एंबुलेंस नहीं आएगी और आखिरकार उसकी डिलीवरी की पहली सवारी एक खटिया ही बनेगी।


Key Highlights:

  • गिरिडीह की घटना के बहाने ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य।

  • RIMS-2 के अरबों रुपये के प्रोजेक्ट और जमीनी हकीकत के बीच विरोधाभास।

  • स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी को संबोधित करते हुए व्यवस्था पर सवाल।

  • सड़क और एंबुलेंस के अभाव में आज भी “खटिया एंबुलेंस” ही ग्रामीणों का सहारा।

  • व्यंग्य में विकास के दावों और ग्रामीण मजबूरियों का मार्मिक चित्रण।


 

साहेब, रिम्स-2 में करोड़ों की मशीनें लगाइए, लेकिन गांव तक पहुंचने के लिए कम से कम चार मजबूत कंधों का भी कोई बजट बना दीजिए। क्योंकि फिलहाल तो यही “मानव एंबुलेंस सेवा” सबसे नियमित चल रही है।

सरकारी फाइलों में सड़क “स्वीकृत” है, टेंडर “प्रक्रियाधीन” है, प्रस्ताव “विचाराधीन” है और काम “शीघ्र शुरू होगा”। लेकिन गांव वालों के लिए प्रसव पीड़ा कभी विचाराधीन नहीं होती। वह समय देखकर नहीं आती। इसलिए हर बरसात में खटिया फिर ड्यूटी पर लग जाती है।

स्वास्थ्य मंत्री साहेब इरफान अंसारी से विनम्र आग्रह है कि अगली बार जब स्वास्थ्य योजनाओं की समीक्षा करें, तो एक नई योजना भी शुरू कर दीजिए…

“मुख्यमंत्री खटिया एंबुलेंस सुदृढ़ीकरण मिशन”।

इसके तहत हर पंचायत को सरकारी खटिया मिले, साथ में चार प्रशिक्षित कंधे भी। जरूरत पड़े तो खटिया पर विभाग का लोगो भी छपवा दीजिए, ताकि लोगों को लगे कि सरकार उनके साथ चल रही है।

वैसे भी झारखंड में कई योजनाएं कागज पर दौड़ती हैं और मरीज खटिया पर।

साहेब, रिम्स-2 की ऊंची इमारतें तब और सुंदर लगेंगी, जब वहां तक पहुंचने के लिए किसी गर्भवती मां को चार किलोमीटर कीचड़ में खटिया पर सफर नहीं करना पड़ेगा।

क्योंकि अस्पताल की असली शुरुआत अस्पताल के गेट से नहीं, गांव की उस पहली पगडंडी से होती है जहां एंबुलेंस का पहिया रुक जाता है और इंसान का कंधा चल पड़ता है।

जब तक गांव की सड़क नहीं बनेगी, तब तक झारखंड की सबसे तेज, सबसे सस्ती और सबसे मजबूर एंबुलेंस का नाम रहेगा…

“खटिया एंबुलेंस।”

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