रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने मकान मालिक और किरायेदार से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी संपत्ति की बेदखली की जरूरत मकान मालिक की वास्तविक आवश्यकताओं पर निर्भर करेगी, न कि किरायेदार की राय पर। हाईकोर्ट के जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने किरायेदार की इस दलील को खारिज कर दिया कि मकान मालिक के पास वैकल्पिक परिसर उपलब्ध है और आंशिक बेदखली से काम चल सकता है।
कोर्ट ने कहा कि झारखंड भवन (लीज, किराया और बेदखली) नियंत्रण अधिनियम, 2000 की धारा 14 के तहत पारित आदेश के बाद धारा 14 (8) लागू हो जाती है, जिससे दूसरी अपील स्वीकार्य नहीं होती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किरायेदार यह तय नहीं कर सकता कि मकान मालिक को कौन सा परिसर खाली करवाना चाहिए।
यह मामला एक किराए की संपत्ति से जुड़ा था, जहां किरायेदार ने खाली करने से इनकार कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे अपीलीय न्यायालय ने भी बरकरार रखा। इसके बावजूद, किरायेदार ने देरी, सीमा और रोक का हवाला देते हुए दूसरी अपील दायर की। हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया और कहा कि केवल वही कानूनी प्रश्न उठाए जा सकते हैं, जो सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के तहत उचित रूप से तैयार और वारंट किए गए हों।
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि किरायेदार ने एक दशक से अधिक समय तक मुकदमेबाजी जारी रखी, जबकि तथ्य और कानून दोनों ही उसके खिलाफ थे। हाईकोर्ट ने दूसरी अपील को खारिज करते हुए अंतरिम रोक हटाने और ट्रायल कोर्ट को रिकॉर्ड लौटाने का आदेश दिया।


















