विकास से सुशासन तक, नीतीश ही हैं बिहार की पहली पसंद

पटना : नीतीश कुमार पिछले लगभग 20 सालों से बिहार की राजनीति में सक्रिय हैं। उन्होंने कई बार मुख्यमंत्री पद संभाला और हर बार अपनी स्थिति मजबूत की। उनका अनुभव और नेतृत्व क्षमता पार्टी और गठबंधन को स्थिरता प्रदान करती है। इतना ही नहीं नीतीश कुमार को गठबंधन के माहिर खिलाड़ी के रूप में जाना जाता है। वे अपनी पार्टी जदयू के अलावा भाजपा समेत एनडीए के अन्य घटक दलों को भी संतुलित कर सरकार चला रहे हैं। यही वजह है कि गठबंधन की राजनीति में उनकी भूमिका अनिवार्य है। उन्होंने जातिगत समीकरण और सामाजिक न्याय की राजनीति को इस तरह सामंजस्य बिठाया कि पिछड़े, अति पिछड़े और दलित वर्गों में उनकी पकड़ मज़बूत होती चली गई। यही वजह है कि आज भी बिहार के चुनावी समीकरण में नीतीश सबसे बड़े ‘फैक्टर’ माने जाते हैं।

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सामाजिक न्याय के सूत्रधार – नीतीश कुमार

बिहार की आबादी में पिछड़े वर्ग 27.12 फीसदी, अति पिछड़े वर्ग 36.01 फीसदी, अनुसूचित जाति 19.65 फीसदी एवं अनुसूचित जनजाति 1.68 फीसदी हैं। नीतीश कुमार ने इन वर्गों को योजनाओं और आरक्षण के माध्यम से सीधा लाभ पहुंचाया। पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देकर उन्होंने सामाजिक भागीदारी का नया मॉडल खड़ा किया। नीतीश सरकार ने पिछले वर्षों में कई ऐसी योजनाएं शुरू कीं, जिन्होंने उनके वोट बैंक को और मजबूत किया। वृद्धावस्था, विधवा और दिव्यांगजन पेंशन की राशि को बढ़ाकर 400 से 1100 रुपए प्रति माह कर दिया गया। हाल ही में घोषित मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत हर परिवार की एक महिला को 10,000 की सहायता और सफल संचालन पर दो लाख तक की मदद दी जा रही है। सबसे बड़ी उपलब्धि रही कि, एनएसओ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 में बिहार की आर्थिक विकास दर 8.64 फीसदी दर्ज की गई, जिससे देश के कई राज्यों को बिहार ने पीछे छोड़ दिया है।

आगामी चुनाव में प्रभाव

इन योजनाओं और पहलों ने नीतीश कुमार की लोकप्रियता को और मजबूती दी है। आज बिहार की राजनीति में वे केवल एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक ऐसे नेता माने जाते हैं जिन्होंने विकास और सामाजिक न्याय को साथ लेकर चलने का मॉडल बनाया है। वहीं विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह अभी तक न तो एकजुट हो पाया है और न ही जनता के सामने कोई ठोस नेतृत्व या वैकल्पिक विज़न पेश कर पाया है। राजद हो या कांग्रेस, जनता के बीच उनकी पकड़ उतनी मजबूत नहीं दिखती, जबकि नीतीश लगातार अपने ‘सुशासन’ और ‘विकास कार्यों’ को जनता तक पहुंचाने में सफल रहे हैं। इन सभी कारकों को मिलाकर देखा जाए तो आगामी विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को चुनौती देना विपक्ष के लिए बेहद मुश्किल है। जातिगत संतुलन, सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण और विकास दर के आंकड़े ये सब मिलकर उन्हें एक बार फिर सत्ता की दौड़ का सबसे मज़बूत, भरोसेमंद और सर्वाधिक लोकप्रिय उम्मीदवार बनाते हैं।

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